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प्रतिक्रिया

दि०20-11-2018 के सम्मानित दैनिक जागरण लखनऊ के सम्पादकीय पृष्ठ पर श्री भूपेन्द्र यादव जी का "राजग के मुकाबले हांफता महागठबंधन"शीर्षक पढ़ा।यादव जी के विचारों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ।इसमें कोई दो राय नहीं है।भाजपा निरंतर योजना बद्ध तरीके से जनाधार बढ़ाने में लगी रही आज वह मजबूत स्थिति में है।जबकि महागठबंधन में असमंजस की स्थिति में है।उनका साझा नेता भी अभी तक तय नहीं है।कि किसके नेतृत्व में  लोकसभा चुनाव 2019 लड़ा जायेगा।लेकिन भाजपा अति आत्म मुग्धता से बचना होगा।बहुत संभल कर बयानबाजी करनी होगी।जनता के पास विकल्प का अभाव है।कोई अन्य क्षेत्रीय दल सरकार बनाने के जादुई आंकड़े के आस-पास भी नहीं फटक रहा है।यहीं कारण है कि भाजपा पहली पसंद बनी हुई है।राष्ट्र वादी सोंच ,विदेशों में भारत की बढ़ती ताकत और सबसे बड़ा जनता का विश्वास ही भाजपा को अन्य पार्टियों से अलग पहचान दिलाने में सफल हुई है।प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।
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आजादी की अमर नेत्री नीरा नागिन ....विनोद पटेल

आजादी की इस अमर नेत्री को अंग्रेजी शासक ने इतनी यातनाएं दी गईं कि जानकारी होने पर आपका कलेजा मुँह को आजायेगा और नेहरू ही नही नेहरु परिवार कहता है कि चरखा से आजादी मिली?
         नीरा आर्य की कहानी। जेल में जब मेरे स्तन काटे गए ! स्वाधीनता संग्राम की मार्मिक गाथा। एक बार अवश्य पढ़े, नीरा आर्य (१९०२ - १९९८) की संघर्ष पूर्ण जीवनी ।
        नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में भारतीय  सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा के मन मे देश की आजादी के प्रति उत्कट भावना थी । नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए इन्होंने अंग्रेजी सेना में तैनात अपने ही अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी |      नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है -👇🏼      5 मार्च 1902 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के खेकड़ा नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी सेठ छज्जूमल के घर जन्मी नीरा आर्य आजाद हिन्द फौज में रानी झांसी रेजिमेंट की सक्रिय सिपाही थीं, जिन पर अंग्रेजी सरकार ने , इनपर भी गुप्तचर होने का झूठा आरोप लगाया था।       बीरबाला नीरा ​को "…

रक्त पिआसु और भृष्टाचारी

आदरणीय सम्पादक जी सादर प्रणाम।पुराने जमाने में हमारी ईमानदारी, सत्यता,सदाचार के चर्चे देश,विदेशों में हुआ करते थे।लोगों में ईमानदारी, सत्यता गुरुकुलों, आश्रमों में कूट-कूट कर भरे जाते थे।चीनी यात्रियों ह्वेनसांग, फाह्यान नें अपनी-अपनी पुस्तकों में उल्लेख किया है कि यदि आपकी कोई वस्तु खो जाती थी तो वर्षों बाद भी उसी जगह पड़ी मिलती थी।कोई उस वस्तु को उठाया नहीं करता था।ईमानदारी के ऐसे उदाहरण मिला करते थे।यहां लालच,बेईमानी के लिए कोई स्थान नहीं था।सदाचार और धार्मिक शिक्षा,शास्त्रों, शस्त्रों की शिक्षा गुरुकुलों, आश्रमों में ऋषियों, मुनियों, विद्वानों द्वारा कूट-2कर भरी जाती थी।गरीब-अमीर की शिक्षा में कोई भेदभाव नहीं था।गुरू संदीपनि मुनि के आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण और गरीब सुदामा के एक साथ शिक्षा ग्रहण करने का बहुत ही सुंदर उदाहरण मिलता है।द्रुपद नरेश और गुरू द्रोणाचार्य की शिक्षा भी एकसाथ और एक ही आश्रम में होने का उदाहरण मिलता है।हमारे सदाचार और ईमानदारी की कसमें खाई जाती थी।जब से भृष्टाचार रूपी राक्षस का जन्म हुआ तबसे हम धीरे-धीरे अनैतिक होते चले गए।आज स्थिति यह है कि हम भृष्टता,बेईमा…

कुण्ठित प्रतिभा / प्रतिभा पलायन

भारत भूमि हमेशा से ही प्रतिभा सम्पन्न  लोगों की भूमि रही है।यहां प्रतिभाएं गली,कूचों,मुहल्लों में थोक के भाव भरी पड़ी हैं।जरूरत उन्हें तराश कर कोहिनूर हीरा बनाने की है।यह जरूरी नहीं है कि केवल शहरों में ही प्रतिभा सम्पन्न बच्चे मिलेंगे।गांव देहातों में भी शहरों की भांति विलक्षण प्रतिभा धनी बच्चे पाए जाते हैं।जरूरत एक पारखी नजर की है जो प्रतिभा ढ़ूंढ़ सके।   हमारे देश में जब से भृष्टाचार नें जन्म लिया है , तब से प्रतिभाएं कुण्ठित ज्यादा हो रही हैं।लगभग हर बार प्रतियोगी परीक्षाओं के समय पर्चा आउट होना एक आम बात होती जा रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सादी कापी जमा करना भी एक ट्रेण्ड बनता जा रहा है।सादी कापी वह अभ्यर्थी ही  जमा करता है जिसकी सेटिंग- गेटिंग पहले से ही हो जाती है। ऐसे प्रकरणों में 5-6 लाख रुपयों में में पहले से ही सौदा पक्का हो जाया करता है। सौदे के आधे पैसे एडवांस जमा हो जाया करते हैं, बाकी पोस्टिंग लेटर मिलनें के बाद। जहां ऐसी सेटिंग-गेटिंग पहले ही हो जाती हो वहां प्रतिभा आखिर क्या मायने रखती है।रिजल्ट घोषित होनें पर हम पाते हैं उत्तीर्ण अभ्यर्थियों में रिश्वत देनें वाले ह…

[ M १४ ] हृदय रोग और पागलपन : कारण और उपचार [ भाग दो ]

web - gsirg.com [ M ]हृदय रोग और पागलपन : कारण और उपचार [ भाग दो  ]
इलाज का तीसरा चरण
पीपल के पेड़ से तो आप परिचित ही होंगे , क्योंकि यह पेंड़ लगभग हर जगह आसानी से उपलब्ध हो जाता है | इस पेड़ के पर्याप्त मात्रा में पत्ते लाकर , शाम को पानी में भिगो दें | सुबह होने पर '' भपके '' के जरिए इन पत्तों का अर्कनिकाल लीजिए | इस अर्कको सुरक्षित बोतलों में भरकर रख लीजिए | इसकी भी लगभग 50 ग्राम मात्रा नाश्ते के 1 घंटे बाद सेवन किया करें इस औषधि सेवन के 50 मिनट पश्चात तक कुछ न खाएं | यहअर्क दिन मेंतीन बार लिया करें | अर्क सेवन के 50 मिनट पहले तथा एक घंटा बाद कुछ भी न खाएंऔर न ही पिए |
सावधानी
रोगीको चाहिए कि वह अपने पास एलोपैथिक औषधि '' सोर्बिट्रेट 5 mg '' कि गोलियाँअपने पास अवश्य रखें | कभी-कभी ऐसा होता है कि चिकित्सीय परीक्षण में भी रोग की सही तीव्रता का पता नहीं लग पाता है | इसलिए हो सकता कि आपको अचानक हृदय रोग की पीड़ा होने लगे | ऐसे मे यह गोलियां आपके उपचार मे काम आएंगी | ह्रदय रोग का आभास होने पर इसकी एक गोली जीभ के नीचे रख लेने से , हृदय रोग की पीड़ा से आप का बचाव…

[ M 14 ] हृदय रोग और पागलपन कारण और उपचार [ भाग एक ]

web - gsirg.com [ M ]हृदय रोग और पागलपन : कारण और उपचार [ भाग एक ] मानव शरीर के समस्त महत्वपूर्ण अंगों में हृदय सर्वश्रेष्ठ अंग है | इसको सब अंगोंका राजा कहा जा सकता है | आदमी के शरीर का यह अंग जितना ही महत्वपूर्ण और उपयोगी है , उतना ही जटिल इसकी बीमारियां भी हैं | इसकी बीमारियों को ठीक करने के लिएचिकित्सक लोग प्रायः मूल्यवान औषधियों का ही प्रयोग करते हैं , जैसे मोती , स्वर्ण भस्म , जवाहर मोहरा आदि | क्योंकि हमारा देशएक कृषि प्रधान देश है , इसलिए यहां कीअधिसंख्य जनता के पास इतना अधिक पैसा नहीं होता हैकि , वह महंगा इलाज करा सके | परंतु हमारे देश पर प्रकृति माता इतनी दयालु है , कि उन्होंने गरीबों के लिए ऐसी ऐसी विभिन्न वनस्पतियां पैदा कर दी हैं , जिनसे वे लोग आसानी से कठिन रोगों से मुक्ति पा जाते हैं |
हृदय रोग का कारण
लोगों में हृदय रोग होने का प्रमुख कारण खानपान में गड़बड़ी , अनुचित आहार विहार और प्रदूषित वातावरण जिम्मेदार हैं | इसके लिए कुछ हद तक इस रोग के रोगी इस रोग के होने के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं | उनके कुछ ऐसे क्रियाकलाप भी होते हैं जो उन्हें हृदय रोगी तथा पागलपन जैसे रोगों को अपन…

[ lL14 ] धनतेरस

Gsirg.com  [ L 14 ] धनतेरस क्या आप जानते हैं कि क्यों मनाई जाती है ? अगर नहीं तो आइए जानते हैं हमारे धार्मिकग्रंथों में एक कथा आती है किएक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे , कि उनकी धर्मपत्नी , लक्ष्मी जी ने भी साथ चलने का आग्रह किया. विष्णु जी ने उनके समक्ष एक शर्त रख दी और बोले- 'यदि मैं जो बात कहूं, वैसे ही मानो, तो चलो.' लक्ष्मी जी ने स्वीकार किया और भगवान विष्णु, लक्ष्मी जी के साथ भूमण्डल पर विचरण हेतु आ गये | कुछ देर बाद एक स्थान पर आकर भगवान विष्णु लक्ष्मी से बोले- 'जब तक मैं न आऊं, तुम यहां पर ठहरो | मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर न आनाऔर देखना भी नही | विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी जी को कौतुक उत्पन्न हुआ कि आखिर दक्षिण दिशा मे ऐसा क्या है जो मुझे श्रीविष्णु द्वारा मनाकर किया गया है , और भगवान स्वयं दक्षिण में क्यों गए | कोई कोई रहस्य जरूर है | वह इसी पर विचार करने लगी | जैसे जैसे उनका विचार का समय बढ़ता गया .उनकी उत्सुकता भी बढती गयी |अंत मे लक्ष्मी जी से रहा न गया | जैसे ही भगवान ने राह पकड़ी, वैसे ही मां लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ी …