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आध्यात्मिकता अपनाएं सद्गुण बढ़ाएं [ 1/14 ]


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आध्यात्मिकता अपनाएं सद्गुण बढ़ाएं 
     
        परोपकारी और आध्यात्मिक व्यक्ति अध्यात्म के शिखर पर पहुंचा हुआ व्यक्ति होता है | वह दूसरों के परोपकार के कार्य करता रहता है |वह अपने जीवन के संबंध में किसी को कुछ भी नहीं बताता है, जबतक कि उसे आध्यात्मिक जीवन में कुछ बोलना प्रासंगिक या प्रेरणादायक न हो | आध्यात्मिक व्यक्ति किसी भी प्रकार का दिखावा यह आडम्बर नहीं करता है और न ही आत्मप्रशंसा करता है | उसको अपने विषय में बातचीत करना पसंद नहीं आता है | वह तो यथार्थ का समर्थक होता है | उसका अपना विचार होता है कि जो व्यक्ति किसी की चापलूसी करता हैं, मुझे अपने को उससे दूर रहना चाहिए | वह केवल भले व्यक्तियों को ही अपने पास रखना चाहिए, जो वक्त पड़ने पर उसके हितेषी सिद्ध हो सके |
  
\\ उन्नत आध्यात्मिक व्यक्ति \\
      
     आध्यात्मिक व्यक्ति मूल रूप में रचनात्मक विचारों वाला होता है | उसे संसार में ईश्वरीय ज्ञान  फैलाने की इच्छा होती रहती है | उसका ज्ञान भी परिष्क्र्त और उच्च कोटि का होता है, जो हृदय की गहराइयों से पैदा होता है | उसे इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए किसी पुस्तक की आवश्यकता नहीं होती है | उसको सारा ज्ञान अध्यात्म में लीन होने पर स्वयं ही मिलने लगता है |
    
अध्यात्म का मर्मज्ञ 
     
     आध्यात्मिक व्यक्ति आध्यात्म के भेद को भली भांति जान घुका होता है |आध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति और परिष्कार
के बाद वह उसे अपने व्यवहार में भी लाने लगता है | इस स्थिति में उसके स्वभाव में वर्ग, धर्म, जाति, लिंग और राष्ट्रीयता की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं | इन सीमाओं से ऊपर उठकर उसकी सोच वैश्विक हो जाती है | इन गुणों से परिपूर्ण होने पर उसे सभी मनुष्य और सभी प्राणी ईश्वर की ही अभिव्यक्ति दिखाई देने लगते हैं | इसके बाद वह संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानने लगता है | यही नही वह विश्व की हर वस्तु और प्रत्येक सजीव से एक समान व्यवहार करने लगता है |

तर्क रहित व्यक्ति
    
     ऐसा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अपने कर्मों, सोच और रहन सहन से पूर्ण रूप से आध्यात्मिकता से परिपूर्ण परिष्कृत व्यक्ति बन चुका होता है | ऐसे मे उसे तर्क करना मिथ्या लगने लगता है | क्योंकि वह इस तथ्य कोजान चुका होता है कि संदेहवादी व्यक्ति के संदेह को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता है | क्योंकि संदेह्वादी व्यक्ति हर बात में संतुष्ट नहीं होता है, तथा उसे संतुष्ट करना संभव ही नहीं होता है | इसके अलावा वह यह भी जानता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए तर्क की आवश्यकता भी नहीं होती है | क्योंकि उसके मन में किसी प्रकार का संदेह नहीं होता है |
  
 दैवीय गुणों का प्रशंसक 
     
    एक आध्यात्मिक व्यक्ति की यह कोशिश होती है कि उसके अंदर सभी प्रकार के दैवीय गुण आ जाएं | इसीलिए वह अपने आप को यथासंभव वैसे ही वातावरण में रहने और उसी के अनुरूप अपने जीवन को ढालने और अपनाने का प्रयास करता है | तथा उसका अनुकरण भी करने लग जाता है | इस प्रकार वह दैवीय गुणों को अपनाकर उसे मूर्त रुप देना चाहता है | उसका विश्वास दुनिया को उपदेश देने में बिल्कुल नहीं होता है | वह चाहता है ईश्वरीय गुणों को सीखा भी जाए और उन्हें जीवन में उतारा भी जाए | वह ऐसा इसलिए करता है ताकि लोग उसके क्रिया-कलापों से प्रेरित होकर जन कल्याणकारी कार्य  |करें जिससे संपूर्ण विश्व का कल्याण हो सके | ऐसा करके वह जनसामान्य को सद्मार्ग पर लाना चाहता है |
   
 दूसरों को विवश नहीं करता 
    
    आध्यात्मिक व्यक्ति किसी भी रुप में, किसी भी व्यक्ति को, किसी भी अवस्था में आहत नहीं करता चाहता है | इसके विपरीत वह आहत हुए व्यक्ति से  उसके दुखों को दूर करने का प्रयास करता है | ऐसा करके उसे खुशी की अनुभूति होती है |क्योंकि वह  सम्पूर्ण विश्व को अपना एक परिवार समझाता है | यही कारण है कि वह चाहता है कि दुनिया के लोग इंद्रिय संवेगों से मिलने वाले क्षणिक सुख के वशीभूत ना हो | क्योंकि यह सभी सुख अस्थाई होते है | असली आनंद तो अपने को ईश्वर की परम सत्ता से जोड़ने में और उसके दिए गए आदेशों का पालन करने में ही होता है |

अपराधबोध का मुक्तिदाता
    
    क्योंकि आध्यात्मिक व्यक्ति कभी किसी का अहित नहीं करता है और न किसी का करता है | इसलिए वह चाहता है कि लोग भी कोई ऐसी गलती ना करें जिससे दूसरे का मन आहत हो | अगर कोई व्यक्ति  भूलवश दूसरे का अहित करता है, तथा कुछ समय पश्चात अपनी गलती का एहसास करता है,और अपनी गलती का सुधार कर पश्चाताप करनाचाहता है, उससमय ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक व्यक्ति उसके अपराधबोध को समाप्त करवाने की कोशिश करता है | साथ ही उसकी इसप्रकार से सहायता करता है कि उसका अपराधबोध शून्य हो जाये और त्रुटी करने वाला पुनः उस कमी को न दोहराए | वह उसे महसूस  भी नहीं होने देता है की उससे भूतकाल में कोई गलती भी हो चुकी है | कहने का तात्पर्य यह है कि वह त्रुटि करने वाले का परिमार्जन और परिष्करण भी कर देता है | आध्यात्मिक व्यक्ति किसी को विवश करा कर या उस पर आधिपत्य जमाकर उससे कोई कार्य नहीं करवाना चाहता है | उसका विचार तो लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान कर उनका दुख, अपराधबोध और त्रुटियों को मिटाना होता है | वास्तव में उनके लिए सुखमय जीवन का निर्माण करना चाहता है |

 निजी इच्छाओं का विलोपन
     
    आध्यात्मिक व्यक्ति अपने जीवन में केवल अपनी और अपने आसपास के लोगों की आत्मिक उन्नति चाहता है | इसके लिए वह अपनी इच्छाओं का समापन या दमन कर देता है | क्योंकि वह जानता है यदि उसने निज इच्छाओं को समाप्त नहीं किया तो उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान नहीं मिल सकेगा |  ऐसे में  वह और आसपास का वातावरण ईश्वर की इच्छाशक्ति के अधीन नहीं हो पाएगा | क्योंकि वह ईश्वर की तीव्र इच्छा के आधीन रहना चाहता है, इसलिए अपनी आकांक्षाओं का दमन करना उसके लिए श्रेयस्कर हो जाता है |

व्यक्तित्व का मूल्यांकन नहीं करता
    
     आध्यात्मिक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं करता है | वह उस व्यक्ति के आंतरिक मन तथा आत्मा को शुद्ध कर उसे बहुमूल्य तथा ज्नक्ल्यानकारी बनाना चाहता है | इसलिए वह अपने प्रयासों द्वारा दूसरे की आत्मा की गहराइयों में छुपी हुई है प्रतिभा को टटोलने की कोशिश भी करता है | एक प्रकार से कुछ समय के लिए वह उनका गुरु को हो जाता है | उसका प्रयास होता है कि अन्य लोगों में भी वैसे ही गुण आ जायं जैसे कि उसके अंदर हैं, ताकि वस लोग भी उन गुणों को अपने में आत्मसात कर उन्नति कर सके |

 अन्यों की उपेक्षा नहीं करता
     
    आध्यात्मिक व्यक्ति का उद्देश्य दूसरों की भलाई करना होता है | इसलिए वह दुनिया के गरीब और भोलेभाले दोनों ही लोगों के संपर्क में रहता है | उसका प्रयास होता है कि वह बुरे लोगों को भी सज्जन बना दे | ऐसा करने के लिए वह उनकी किसी प्रकार से उपेक्षा नहीं करता है | वैसे भी यदि कोई उसका छोटा सा इससे सम्बन्धित कार्य संपादित कर देता है, तो वह उसका आभारी हो जाता है, और उसका प्रशंसक बन जाता है | ऐसा करके वह सभी व्यक्तियों में मानवीय गुणों का संचार करना चाहता है |

 अनासक्त और अवैयक्तिक पुरुष 
    
    आध्यात्मिक व्यक्ति का गुरु नहीं होता है | परंतु यदि किन्ही कारणों से उसे किसी को अपने गुरु का परिचय देना होता है, उस समय वह अपने गुरु को अनासक्त और अशरीरी बताता है | उसका व्यवहार अपने शिष्यों के प्रति प्रेम रस से भरा होता है | इसीलिए वह अपने शिष्यों को दिव्य प्रेम से ओतप्रोत तथ्यों को बताकर उन्हें अच्छे मानव बनाने के लिए रहता है | वह चाहता है कि उसके सभी शिष्य या उसके समर्थक उसी का अनुकरण करें | ताकि उनका संबंध भी ईश्वर से हो सके तथा वह भी ईश्वर से साक्षात्कार कर सकें | तथा वह भी अपना जीवन समुन्नत बना सकें |

अंत में 
    
     सारांश के रूप में हम यह कह सकते हैं कि आध्यात्मिक व्यक्ति का व्यक्तित्व अलौकिक और दिव्य होता है | उसके सारे क्रियाकलाप इस नश्वर संसार में रहते हुए भी संसारी लोगों से उच्च प्रकृति का होता है | इस प्रकार हम कह सकते हैं कि उसका जीवन ईश्वर उन्मुखी होता है | उसकी आत्मा ईश्वर के विलक्षण प्रकाश से प्रकाशित होती रहती है |
      उसको अपने जीवन में यश, नाम और पद आदि की कामना नहीं होती है | उसका जीवन भक्ति रूपी अमृत रस से परिपूर्ण होता है | उसके अंदर अच्छे भावों का प्रवाह निरंतर चलता रहता है |
     अंत में आध्यात्मिक व्यक्ति के संबंध में यह कहा जा सकता है कि वह प्रकृति के प्रति तथा जीव मात्र के प्रति सहज और स्वाभाविक प्रेम रखता है |

इति श्री

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