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धर्म ; प्रगति का एकमात्र उपाय है तपश्चर्या [ 19 ]

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प्रगति का एकमात्र उपाय है तपश्चर्या
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के दो ही प्रमुख क्षेत्र हैं | इसमें में प्रथम है , भौतिक क्षेत्र , तथा दूसरा है आध्यात्मिक क्षेत्र | इस भौतिक संसार का प्रत्येक प्राणी इन्हीं दो क्षेत्रों में से ही किसी एक को अपने जीवन में क्रियान्वित करना चाहता है | अपने प्रयास से उसको उस क्षेत्र में सफलता लगभग मिल ही जाती है | दोनों ही क्षेत्रों में सफलता के लिए केवल एक ही नियम काम करता है | उस नियम का नाम है तपश्चर्या | प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अभीष्ट श्रम करना पड़ता है | इसके लिए उसे प्रयत्न , पुरुषार्थ , श्रम और साहस का अवलंबन लेना पड़ता है | सफलता को पाने में यह सभी तत्व महत्वपूर्ण है | फिर भी प्रयत्न का एक अलग ही स्थान है |
प्रयत्न परायणता
यह तो सर्वविदित है कि व्यक्ति चाहे किसान हो , मजदूर हो , शिल्पी हो , पहलवान हो , कलाकार हो , चपरासी हो या अखबार हो अथवा कुछ भी हो उसको सफलता प्राप्त के सभी पायदानों को अपनाना ही पड़ता है | व्यक्ति के प्रयत्न में परायणता का इसमें प्रमुख और प्रथम स्थान है | इसे एक प्रकार से महाप्रज्ञा का तत्वदर्शन भी कहा जा सकता है | यह तत्वदर्शन सभी के आत्मिक जीवन में एक समान लागू होता है | किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की संभावना इसी पर ज्यादा निर्भर करती है | साधन में तपश्चर्या की तीव्रता जिस अनुपात में होती है , सफलता भी उसी अनुपात में मिलती है |
तपश्चर्या की साहसिकता
सफलता प्राप्ति के प्रयासों में व्यक्त की ''तपश्चर्या की सार्थकता '' जिस मात्रा तक प्रचंड हो सकती है | सफलता भी उसी के अनुरूप ही मिलती है | उपासना और साधना का तांत्रिक पर्यवेक्षण करने से जानकारी मिलती है , कि पूरे संसार के आत्मविज्ञान का ढांचा ही किसी की प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा पैदा करता है , अर्थात यह ऊर्जा तपश्चर्या के माध्यम से ही उत्पन्न की जा सकती है | प्रत्येक व्यक्ति को अंतश्चेतना का स्तर उच्च करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है | क्योंकि इसके बिना कोई काम ही नहीं चल सकता है | किसी भी व्यक्ति को अगर अपने जीवन स्तर को ऊपर उठाना है , अथवा आगे बढ़ाना है , यदि आगे बढ़कर सफलता पाना है तो उसे कार्यसमर्थता उत्पन्न करके ही किया जा सकता है | अन्यथा की स्थिति में उसमें पात्रता का विकास नहीं होगा |
विभूतियों और सिद्धियों से लाभान्वित होने का अवसर
जब व्यक्ति अपने अंदर समर्थता की पात्रता पैदा कर लेता है | उससमय से ही उसका विकास होना प्रारंभ हो जाता है | आध्यात्मिकप्रगति की दिशा में जिन लोगों ने सफलताएं प्राप्त की हैं , यदि उनके प्रयासों का आदि से अंत तक अध्ययन किया जाए , तब इस तथ्य का प्रमाणीकरण हो पाता है | तब पता चलता है कि केवल ऐसे ही महापुरुषों ने ही आवश्यक तपश्चर्या करके अपनी पात्रता विकसित की है | इस विकास के बाद ही उसे '' विभूतियों '' और '' सिद्धियों '' के लाभ के अवसर प्राप्त हुए हैं | श्रेष्ठ पुरुषों से लेकर ऋषियों और महर्षियों ने इसीप्रकार सफलताएं प्राप्त की हैं | उनकी सभी सफलताएं तप या साधना पर ही निर्भर रही हैं |
प्रबल पुरुषार्थ आवश्यक
भौतिक क्षेत्र में प्रत्येक तरह ही आत्मिकक्षेत्र में भी आत्मपरिष्कार के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने पड़ते हैं | ऐसा करने से ही व्यक्ति में क्षमताओं का विकास होता है , तथा इसी के माध्यम से ही उसमें यह क्षमता पैदा हो जाती है , कि वह किसी की वह अंतरजगत की प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं को जगाकर उसे विभूतिवाहक बना सके | इसके अलावा वह इसी आधार पर देवी के अनुरागियों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है | यह सब कुछ ठीक उसी प्रकार होता है , जैसे एक स्थान पर जमा हुआ धातुभंडार अपनी आकर्षण क्षमता से ही दूर-दूर फैले हुए सजातीय कणों को अपनी ओर खींच लेने की क्षमता पैदा कर लेता है | बिल्कुल यही तथ्य या सिद्धांत आत्मिकप्रगति की दिशा में अक्षरसः से लागू होता है |
साधक में पात्रता का विकास
साधक अपने प्रयासों से जितनी प्रगति प्राप्त कर लेता है , उसी अनुपात में उसका विकास भी होता है | विकास के क्रमशः बढ़ते रहने से उसे अपने वर्चस्व में भी प्रगति मिलती चली जाती है | क्योंकि इन दिव्य उपलब्धियों का उद्गम क्षेत्र ही व्यक्ति का अंतःक्षेत्र में होता है , तथा इसी क्षेत्र में उसे व्यापकं ब्रह्मसत्ता से भी अजस्र अनुग्रह प्राप्त होते चले जाते हैं | इन उपलब्धियों से साधक निहाल होता चला जाता है | इसके बावजूद भी मूल तत्व जहां का तहां ही रहता है | यदि उसे प्राप्त करना है उसका मूल्य भी चुकाना होता है |
उच्च स्तरीय सफलताओं की प्राप्ति
यदि किसी ने भौतिक क्षेत्र में पुरुषार्थ कर लिया है , तब उसके प्रति प्रतिफल का कर्म और भाग्य का सिद्धांत पग पग पर चरितार्थ होता चला जाता है | मां गायत्री महाशक्ति की देवी हैं , उनकी उपासना करने वालों को उनकी आत्मिकभूतियां प्राप्त करने के लिए भी उपयुक्त पुरुषार्थ करने का सिद्धांत , सरलता से समझ में आता रहता है | उन्हें यह जानकारी हो जाती है कि आत्मिक पुरुषार्थ का नाम ही तपश्चर्या है , इसीलिए वह लोग उसी का अनुसरण करते हुए , प्राचीन काल के महान आत्मवेत्ताओं की तरह उच्च स्तरीय सफलताएं प्राप्त करने में सफल हो पाते है | उनकी इस सफलता में तपश्चर्या का प्रमुख स्थान होता है |
उच्च स्तरीय आदर्शों का परिपालन
तपश्चर्या के माध्यम से ही सफलताएं प्राप्त करनेवालों में स्वार्थपरता या लोकलालसाएं नहीं होनी चाहिए | उसे अपने अंदर दैवीय परंपराओं को इस प्रखरता के साथ अपनाना चाहिए कि उसके समक्ष पशुता को सफलता न प्राप्त हो सके | व्यक्ति को आत्मिकप्रगति की उपलब्धि का उचित मूल्य चुकाने का साहस भी होना चाहिए , क्योंकि सिद्धियां सदा ही पुरुषार्थों वालों को ही मिलती रही हैं | उसे पूरी तरह इस तथ्य स्मरण रखना चाहिए , कि किसी को काया कष्ट देना ही नहीं है , बल्कि उच्च स्तरीय आदर्शों का पालन करना है | तथा जनोपकर के ही कार्य करते रहना है | उसको इस तथ्य को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना ही तपसाधना या तपश्चर्या कहलाता है |
इति श्री
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