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धर्म ; ईश्वर का संस्पर्श है प्रार्थना [26 ]

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धर्म ईश्वर का संस्पर्श है प्रार्थना
इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपने ईष्ट की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए , सच्चे मन से जिन शब्दों का उच्चारण करता है , उसे हम सब प्रार्थना के नाम से जानते हैं | यह शब्द ईश्वर , अल्लाह गाड या किसी के प्रति हो सकते हैं , जिसके प्रति उसका श्रद्धाभाव हो | यह एक प्रकार से उसके अपने अंतःकरण की भावाभिव्यक्ति की प्रक्रिया है प्रार्थना | इस प्रकार से अपने ईष्ट की श्रद्धा तथा अंतःकरण की सच्ची पुकार को ही प्रार्थना कहा जाता है | प्रार्थना एक लयबद्धता है , जो हमारे मन के अंदर की गहराई से उद्घटित होती रहती है | इसके ही माध्यम से साधक विराट की ओर उन्मुख होता है | प्रार्थना के शब्द किसी तरह के तर्क और भाषा से परे होते हैं |
कृतज्ञता के भाव का प्राकट्य
प्रत्येक मानव द्वारा की गई प्रार्थना में उसकी कृतज्ञता का भाव होता है , जिसमें उसके शुभ विचार सम्मिलित होते हैं | इसे मानव के अंतकरण से निकली हुई करुण पुकार के रूप में भी जाना जाता है | अगर किसी का विचार है की प्रार्थना एक प्रकार की याचना है तब भी इसे अनुचित नही कहा जा सकता है | इसे थोड़ा समझने की आवश्यकता है | जब हम अपने आराध्य से कुछ मांगते हैं , तो वह भी प्रार्थना ही है | वस्तुतः प्रार्थना और याचना में काफी अंतर है , क्योंकि जब याचना की जाती है तब यह अनुभव किया जाता है कि हम दीन , हीन और दरिद्र है ,तथा किसी के सामने अपनी इच्छा की पूर्ति के गिड़गिड़ा रहे हैं | जबकि प्रार्थना का स्वरूप इससे बिल्कुल ही भिन्न है|
ईष्ट से जुड़ने का माध्यम
प्रार्थना में हम कृतकृत्य होते हैं , कृतार्थ होते हैं और कृतज्ञ होते हैं | प्रार्थना एक प्रकार से भक्त और भगवान के मिलन का माध्यम है | प्रार्थना में कृतज्ञता का भाव निहित होता है | जिसके उच्चतम बिंदु पर या जिस शिखर पर भक्त और भगवान का मिलन होता है | यही प्रार्थना होती है | इसलिए सभी धर्मों में प्रार्थना को किसी न किसी रूप में सम्मिलित किया गया है |
सभी धर्मों में मान्यता
सभी धर्मों ने किसी न किसी से इसका समर्थन किया है , इसीलिए हर धर्म में प्रार्थना की एक निश्चित प्रथा है | उसी के अनुरूप ही प्रार्थना की एक विशेष प्रथा की विधि भी निश्चित और निर्धारित की गई होती है | प्रार्थना के लिए हिंदू लोग नित्य प्रति संध्या वंदन करते हैं अर्थात इसमें त्रैकालिक संध्या का विधान है | इस विधान में कुछ क्रियाएं होती हैं जैसे कि योगमाता माँ गायत्री को मानने वाले उनके मंत्र के माध्यम से अपने भावों को भगवान को समर्पित करते हैं , और उनके कृपापात्र बनने का अवसर ढूंढते रहते हैं | जबकि इस्लाम में इस सभी को प्राप्त करने के उद्देश्य से पांच वक्त की नमाज अदा की जाती है | यह भी एक प्रकार की प्रार्थना ही है | इसी प्रकार ईसाई लोग चर्च में या घरों में प्रार्थना करते हैं | ईसाइयों में प्रार्थना का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है , इन लोगों के यहां पर एकल या सामूहिक प्रार्थना होती है | इस प्रकार से प्रार्थना एक विचार , या एक भाव या एक श्रद्धा है | जिसमे लोग अकेले या कई लोगों एक साथ मिलकर ईश्वर को पुकारते हैं | इस प्रकार से प्रार्थना करने पर उनमे में एक प्रकार की भाव तरंगे उठती हैं , जिससे प्रार्थना के भाव साकार होने लगते हैं |
प्रार्थना समीकरण नहीं
प्रार्थना कोई गणितीय समीकरण नहीं है , जिसे हल किया जाए | यह बुद्धि के तर्क , विचार और विश्लेषण का विधान नहीं है | इसमें पवित्र और श्रद्धाभाव से निकली हुई पुकार होती है | प्रार्थना के माध्यम से हृदय के द्वार के कपाट खुलते हैं , जिनसे प्रेमपूर्वक परमात्मा हम में प्रवेश करते हैं | इसका कारण है कि श्रद्धा से सत्य प्राप्त होता है , और प्रार्थना के माध्यम से प्राणी सत्यस्वरुप परमात्मा की ओर बढ़ता है |
भावनाओं का उत्थान
प्रत्येक मानव के सामान्य जीवनक्रम में या सामान्य जिंदगी में उसकी भावनाएं विभिन्न दिशाओं में , कई स्थानों पर और कई दिशाओं में परिक्रमित होती रहती है | यह भावनाएं परिजनों में , और उसके कार्यों आदि में घूमती रहती है | जब हम इन भावनाओं को एकजुट कर लेते हैं ,एकाग्र कर लेते हैं या फिर उन पर विजय प्राप्त कर लेते हैं , उस समय प्रार्थना के माध्यम से हमारी भावनाएं ऊपर की ऒर उठती है | ऐसी भावनाओं से जब हम को भगवान याद करते हैं तो हमें हमारी प्रार्थना का उत्तम फल प्राप्त होता है | वास्तव में भावनाओं का उत्थान होना ही ईश्वर से जुड़ने का उचित माध्यम होती है |
सच्चे मन से की गई प्रार्थना सदैव फलीभूत होती है | यदि प्राणी को अपने इष्ट से जुड़ना है तो उसे भावनाओं और सम्वेदनाओं की महीन महीन धागों से प्रार्थना की मजबूत डोरी बनानी होती है | श्रद्धा और पवित्र भावना से बनी एक डोरी से भगवान सदैव भक्तों से जुड़े रहते हैं यही कारण है कि प्रार्थना के क्षणों में उसे भगवान का पर्स मिलता है | अंत में उसका जीवन सफलताओं से परिपूर्ण हो जाता है |
इति श्री

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