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महिमामयी  आदिशक्ति माता भवानी  

       हम अपने धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि उनमें हमारी कई माताएं बताई गई हैं| जिनमें पार्वती माता संतोषी माता और लक्ष्मी माता आदि| लेकिन मां भवानी को आदि शक्ति के रूप में वर्णन करते हुए उन्हें सर्वश्रेष्ठ माता बताया गया है| इन्हें की लीला में  प्रकृति व सृष्टि के सभी घटनाक्रम समाए हैं| अध्ययन करने पर पता चलता है कि प्रकृति के तीन गुणों और उनकी कृतियों विकृतियों से ही ब्रह्मांड का निर्माण होता है| इन्ही में सृष्टि के सभी आरोह और अवरोह जन्म लेते हैं| पूरे संसार की समस्त घटनाओं को संचालित करने वाली ऊर्जा दरअसल मूल प्रकृति ही है यह  ऊर्जा माता जी  द्वारा ही पैदा की और कण्ट्रोल होती है | इसी ऊर्जा में आयी विविध विकृतियों से ही सृष्टि सृजन के बहुआयाम विकसित होते हैं| यहां तक कि देव शक्ति से लेकर विश्व के समस्त कण-कण में समाहित ऊर्जा के विभिन्न रूपों का रहस्य ही  मूल प्रकृति का वैकृतिक  रहस्य है| जिन लोगों ने भवानी मां पर श्रद्धा रखते हुए अपने भाव चेतना में माता जी का स्पर्श और स्नेह पाया है वे जानते हैं कि आदिशक्ति माता की मूल प्रकृति हैं|  और उन्हीं की इसी ऊर्जा द्वारा सृष्टि का सृजन हुआ है|  संसार की इन्हीं जगत माता के विविध रूप संपूर्ण सृष्टि के घटनाक्रमों का आधार पहले भी बनते थे आज भी बने हुए हैं |                                            मूल प्रकृति रूपा महालक्ष्मी का स्वरूप                                         हमारे धर्म ग्रंथों में एक धर्म ग्रंथ है जिसे हम वैकृतिकम रहस्यम के नाम से जानते हैं| इसमें 39 मंत्र हैं इस धर्म ग्रंथ का प्रारम्भ ऋषीवाणी के उच्चारण  से होता  है जिसमें आदिमाता  माँ  भवानी के सभी तत्वों का सत्य और प्रधानिक रहस्य और प्रकृति के स्वरूप को वर्णित किया गया है| धार्मिक के जानकर कहते हैं कि आज से पूर्व प्रावधानित रहस्य में जिन मूल प्रकृति रूपा महालक्ष्मी के स्वरूप का विवेचन किया गया था वही तीन गुणों का आधार हैं| इस वर्णन के बाद ऋषिश्रेष्ठ ने  जगतमाता के प्रमुख त्रिगुणधाराओं के तीनों रूपों का वर्णन किया है| जिसमें बताया गया है कि महाकाली के रूप में वह तमोगुण की अधिष्ठात्री हैं इस रुप में उन्होंने मधु कैटभ नामक राक्षसों का संहार किया था, इसके अलावा महालक्ष्मी के रूप में भवानी मां रजोगुण की अधिष्ठात्री शक्ति इस रुप में उन्होंने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था, तथा महासरस्वती के रूप में सत्वगुण की अधिष्ठात्री बनकर शुंभ निशुंभ नाम के राक्षसों का अंत किया था| उपरोक्त धर्म ग्रंथ में माता के तीनों रूपों का बड़ी सम्मोहकता तथा मनोहरता के साथ अद्वितीय  वर्णन  किया  गया है | इसमें माता के स्वरूप का दिल को प्रशन्न  करने वाला भी मनोहारी  चित्रण किया गया है| श्रीदुर्गासप्तसती  में  वर्णन                                                               वैकृतिक रहस्य के संबन्ध में  हमारी इन आदिशक्ति माता भवानी की रहस्यमय लीला कथाओं को सूत्रों ने पिरोकर  श्री दुर्गा सप्तशती का निर्माण किया गया है|  जिसके  तीन अंगों में द्वितीय  अंग में वैकृतिक रहस्य  में इसी सच को मनोहारी ढंग  से उद्घाटित किया गया है|  श्रीदुर्गासप्तशती में माता की विशाल व्यापक सृष्टि सृजन स्थिति  और लय के सभी रहस्यों को व्यापक रूप में वर्णित किया गया है| ऐसा धार्मिकजनों का  मत है की  इस रहस्य के सच को सही रूप में कह पाना लिख पाना और बता पाना कठिन ही नहीं असंभव है| लेकिन इशारों से ही काफी हद तक कहा-सुना समझा और बोला जा सकता है| जो ज्ञानी हैं और गुणग्राहक हैं वह इन संकेतों को समझकर श्री दुर्गा सप्तशती का विवरण पढ़ और जानकर, मां भवानी जिन्हें हम आदिशक्ति करते हैं उनकी रहस्यमय लोक कथाओं के सभी सूत्रों को जान जाते  हैं| श्री दुर्गा सप्तशती में  इसे  3 अंगों में वर्णित किया गया है|  जिसके द्वितीय अंग में  वैकृतिक रहस्य का यही सच परिलक्षित हुआ है| और कई  अर्थों में यह संज्ञा समीचीन भी है| श्री दुर्गा सप्तशती के तीनों अंगों में वर्णित माता भवानी का विशद वर्णन किया गया है| इसमे  माताजी  की  विशाल व्यापक सृष्टि सर्जन स्थिति एवं लय  के सभी रहस्य समाए हैं| धार्मिक विद्वानों का ऐसा विचार है की माता के सभी रहस्यों  का  सच में संपूर्ण रूप में कह पाना बता पाना और अत्यंत कठिन है| लेकिन उनका मानना है कि अगर संकेतों को समझा जाए तो जो धर्म की गुणी  सुविज्ञ जन ही इसे आसानी से समझ सकते हैं|                                                                धर्म                              कुंडलिनी की  मूलप्रकृति में समाहित हैं माँ                                      विविध देव एवं देवी शक्तियों के रूप में अभिव्यक्त मां भवानी वास्तव में इस ब्रह्मांड की चेतना के सभी आयामों में चल रही शक्ति  की क्रीड़ा को अपनी चेतना में वही व्यक्ति आत्मसात कर सकता है| जिसने स्वयं सत्य की साधना की हो या फिर जिसने अपने आप ही समाहित मूल तत्व का स्वयं साक्षात्कार किया हो| वही इन माताजी  के विविध रूपों का और सत्ता के विभिन्न अंगों का अनुभव भी कर सकता है और वही इस सच को समझ सकता है| प्रत्येक जीव आत्मा की मूल शक्ति के रूप में तीन कुंडल मारे बैठी कुंडलनी  ही मूल प्रकृति है, ऐसा विद्वानों का मत है|                                                       माँ की पूजा विधि                                                            वैकृतिक रहस्य में मां भवानी के इसी सत्य की ओर सांकेतिक रूप से मंत्रों  द्वारा पूजा  की तांत्रिक विधि का वर्णन किया गया  है| और साधकों  के लिए तात्रिक व्याख्या भी बताई गयी है| जिन लोगों ने योग की साधना की है या जो योग साधक हैं वह इतनी संकेतों को समझ कर मां भगवती की लीला का साक्षात्कार कर सकते हैं| और जो मंत्रों के जानकार उपासक  हैं वह माता की मंत्र शक्तियों को जागृत कर के अनेक आश्चर्यों को साकार कर सकते हैं वयकतितव रहस्य में उनका संक्षिप्त उपयोग कर सके तो उसके लिए सभी असंभव जान पढ़ने वाले कार्य संभव हो जाते हैं| इस पूजा की तांत्रिक विधि इसके पश्चात मंत्रों द्वारा भी  पूजा की वह विधि बताई गई है|वैसे तांत्रिक विधि  से  पूजा  विधान काफी  क्लिष्ट हैं इसे  केवल उच्च कोटि  के साधक  ही आसानी से  कर पाते  है | और यह उन्हीं के लिए है भी| जगत माता भवानी के सात्विक उपासकों के लिए ऋषि वाणी देवीसूक्त के नमो देव्यै  आदि  मंत्रों द्वारा स्तुति करने का उपदेश देती है| इस पूजा विधान के प्रकरण में श्री दुर्गा सप्तशती की मंत्र नहीं मां की महिमा गहनता  उजागर होती है| जो संकेत देती है कि मां भगवती के सात्विक और निष्काम साधकों को बलि  एवं मांस का प्रयोग नहीं करना चाहिए |                                             पाठन की विधि के  विषय में                                                                               वैकृतिक रहस्य पूजा की तांत्रिक विधि के बाद पाठ विधि की भी चर्चा की गई है,जो  साधकों के लिये उपयोगी है| इसमें बताया गया है कि इसका पाठ  भक्तिपूर्ण भाव से देवी की प्रतिमा या उनके चित्र के सामने  [ श्री दुर्गा सप्तशती के] तीनों चरित्रों का पठन करना चाहिए| साथ ही  यह भी बताया गया है कि अगर एक ही पाठ का पठन करना हो तो मध्यम पाठ का पठन करें| पहले और अंतिम भाग का पठन न करे| इसके अलावा अगर किसी पाठ  को शुरू किया जाए तो उसे पूरा पढ़ना चाहिए| यदि आप केवल आधा पाठ करेंगे तो साधक की साधना की सफलता संदिग्ध हो जाती है|                                                                                           हवन एवम प्रणाम                                                                                           सबसे अंतिम  कार्य है हवन और प्रणाम | श्री दुर्गा सप्तशती का प्रत्येक श्लोक मंत्र के रूप में है|प्रत्येक साधक को  चाहिए कि वह इन श्लोकों को पढ़े और तेल एवं घृत  भरी हुई आहुति देना चाहिए और सप्तशती में जो स्त्रोत आए हैं मंत्रों से चंडिका के लिए पवित्र हविष्य का हवन करें| इसके बाद जगत माता भगवती से भक्तिपूर्ण से प्रार्थना करें|  और अंत में मन और इंद्रियों को वश में रखते हुए हाथ जोड़कर विनती क़र  देवी मां को प्रणाम करें और अपने मन में स्थापित करने की कोशिश करें|इसके बाद शुद्ध मन से  इस संबंध में देर तक चिंतन भी करें| यह चिंतन इस प्रकार का होना चाहिए कि आप उसी में चिंतन करते करते खो जाएं|                                                                                                     साधकों का अनुभव                                                                             मां भवानी के अनेकों शक्ति साधक हैं उन सभी सत्य साधकों का अनुभव है कि माता भावमयी  हैं और उन्हें अपने भक्तों से बहुत ही प्रेम है| इतना अवश्य है कि साधना में विधि विधान का,स  कर्मकांड का विशेष महत्व है फिर भी यदि सकाम साधना हो तो महत्व और भी बढ़ जाता है| यदि साधक का यह सभी  कार्य भक्ति भाव से परिपूर्ण है और उसके भाव गहरे हैं,और पवित्र  मन से किये  गए  हैं तो  विधि विधान की कर्मकांड की जो कमियां होती हैं वह अपने आप पूरी हो जाती है| ऐसा माना जाता है कि जब भी कोई साधक सच्चे मन से  इ न जगतमाता से किसी चीज की मांग करती है तो वह उसे अवश्य पूरा करती हैं|                                                       उपसंहार                                                                                         मां भगवती,[  भवानी ही  इस ] संसार की श्रेष्ठ देवी होने से एक हैं उन्हें मां मानकर और अपने को उनका पुत्र मानकर यदि कोई साधक उनसे  किसी भी चीज की मांग करता है तो वह उसे जरूर पूरा करती हैं| इसीलिए आज भी माता के  सत्य साधकों का यह बहुत बड़ा कर्तव्य है कि वह अपनी भावनाओं को सदैव शुद्ध पवित्र ,गहन और आंतरिक बनाएं| सारांश यह कि जो भी साधक मां भवानी को अपने सच्चे भावों का अर्घ्य करता है उसकी सभी आकांक्षाएं तृप्त होती हैं,पूरी होती हैं| ऐसा विद्वानों का मत है |    जय मां भवानी 

नी


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