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[ a/1 ]धर्म ; दुख की आवश्यकता

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दुख की आवश्यकता

इस नश्वर संसार के जन्मदाता परमपिता ईश्वर ने अनेकों प्रकार के प्राणियों की रचना की है |इन सभी रचनाओं में मानव को सर्वश्रेष्ठ माना गया है |इस संसार का प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन खुशहाल और सुख में बिताना चाहता है , जिसके लिए वह अनेकों प्रकार की प्रयत्न करता रहता है | इसी सुख की प्राप्ति के लिए प्रयास करते हुए उसका संपूर्ण जीवन बीत जाता है | यहां यह तथ्य विचारणीय है कि क्या मनुष्य को अपने जीवन में सुख प्राप्त हो पाते हैं | क्या मनुष्य अपने प्रयासों से ही सुखों को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर पाता है | यह एक विचारणीय प्रश्न है |


सुख और दुख एक सिक्के के दो पहलू

वास्तव में देखा जाए तो प्रत्येक मानव के जीवन में सुख और दुख दोनों निरंतर आते-जाते ही रहते हैं | सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख की पुनरावृत्ति होती ही रहती है | यह प्रकृति का एक सार्वभौमिक सिद्धांत है | अगर किसी को जीवन में केवल सुख ही मिलते रहे , तब हो सकता है कि प्रारंभ में उसे सुखों का आभास ज्यादा हो | परंतु धीरे-धीरे मानव को यह सुख नीरस ही लगने लगेंगे | जिसके कारण उसे सुखों से प्राप्त होने वाला आनंद धीरे-धीरे कम होता चला जाएगा , और अंत में उसका जीवन उदासीन हो जाएगा | समय के साथ-साथ मानव की यह सुखानुभूति भी शून्य होती चली जाएगी | ऐसी स्थिति में दुख ही है , जो किसी के जीवन में आकर , उसके सुखों को पुनः स्थापित करते रहते हैं | यदि किसी के जीवन में दुख न आए , तब उसके जीवन में सुखों की अनुभूति नहीं हो सकेगी | ठीक इसीप्रकार इसी प्रकार अगर जीवन में सुख न आए तो दुखों की अनुभूति नहीं हो सकती है | अगर इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो सुख और दुख जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू हैं , इससे इनकार नहीं किया जा सकता है |

मानव जीवन में दुख

इस संसार का प्रत्येक प्राणी अपने जीवन को सुखों से भरा देखना चाहता है | वह इस बात की कल्पना ही नहीं करना चाहता है कि उसके जीवन में दुख भी आए | यही कारण है कि प्रत्येक मनुष्य को अपना जीवन दुखों से भरा हुआ दिखाई पड़ता है | इन दुखों से निजात पाने और सुख को अपनाने के लिए मनुष्य अनेकों प्रकार के प्रयत्न करता रहता है | इनसे निवृत्ति के लिए तथा जीवन में सुखों की प्राप्ति के लिए प्रत्येक मानव अनगिनत प्रयास करते भी देखे जाते हैं , परंतु क्या ऐसा संभव हो पाता है | निश्चित रूप से ऐसा नहीं हो पाता है | परन्तु विडंबना यह है कि सुख केवल गिने चुने लोगों को ही मिल पाता है | बाकी के शेष लोगों के साथ ऐसा नहीं हो पाता है | उनका सारा जीवन अतृप्ति , असफलता , असंतोष और अभावों के बीच बीतता रहता है | प्रायः देखने में आता है कि लोग सुख के लिए भटकते ही रहते हैं , परंतु उन्हें अधिक मात्रा में दुख ही मिल पाते हैं | हर एक सांसारिक प्राणी की यही पीड़ा है तथा यही वेदना भी है |


सुख की तलाश

इस संसार का वह प्रत्येक प्राणी जो अपने जीवन में केवल सुखों को तलाशता रहता है | वह इस तथ्य को बिल्कुल ही भूल जाता है कि दुख कहीं बाहर से नहीं आता है , बल्कि दुख का प्रादुर्भाव तो हमारे भीतर ही होता है | हम चाहे कितना भी दुखों के कारण को किसी घटना या परिस्थिति में ढूंढना चाहे , तो भी हमें किसी भी स्थिति और परिस्थिति में इसमें सफलता नहीं मिल पाती है | क्योंकि दुखों की जड़ तो हमारे मन में ही होती है | बाहर ढूंढने में इसके कारण तो अनेको मिल सकते हैं , परंतु इनका समाधान नहीं मिल पाता है | दुखों का समाधान परिस्थितियों को बदलने से नहीं , बल्कि मन की स्थिति को बदलने से ही हो पाता है | हमारे मन की स्थिति जब दूषित और प्रदूषित हो जाती है , तब ही हमारे जीवन में दुख आने लगते हैं | इनसे किसी भी परिस्थिति में बचना संभव नहीं है | तथा इसका अन्य कोई उपाय भी नहीं है |


दुखों से मुक्ति पाने का उपाय

अगर मानव को अपने जीवन में दुखों से मुक्ति पाना है , तो उसे अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना ही होगा | उसे इस दृष्टिकोण को गहरे से अपने मन में बिठाना ही होगा कि उसके जीवन में आए दुखों के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है | उसे जो कुछ भी बाहर घटित होता दिखाई देता है , वह तो केवल अंदर की छाया है | इसीलिए दुखों की जिम्मेदारी उसे स्वयं ही अपने सर पर लेनी होगी | इससे बचना तो सम्भव ही नही है | जीवन में दुख हो या सुख , हर्ष हो या विषाद तथा सम्मान हो या अपमान , इन सब को समान रुप से स्वीकारना ही होगा , तथा अपनी परिस्थितियों की जिम्मेदारी उसे स्वयं पर ही लेनी होगी | उसे इस बात को सदैव ध्यान में रखना होगा कि उसके दुख , उसके द्वारा किए गए कर्मों के परिणाम हैं | इस प्रकार की जिम्मेदारी ले लेने पर उसका जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही बदल जाएगा | इसके साथ ही उसके अंदर दुखद परिस्थितियों से लोहा लेने की ताकत भी आ जाएगी | ऐसा करके ही मानव अपने जीवन में दुखों को अपने से दूर रख सकता है | ऐसा न कर पाने वाला प्रत्येक प्राणी दुखों के झमेले में फंसता ही चला जाएगा |


मनः स्थिति में बदलाव आवश्यक


इस तथ्य से कभी भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि जीवन में दुःख केवल उन्हीं के जीवन में घटित होता है , जो अपनी जिम्मेदारी लेना जानते हैं | अपनी त्रुटियों , गलतियों और बुरे कार्यों की जिम्मेदारी लेकर ही हम अपने जीवन में दुखों को कम करके ही अपने जीवन को सुखपूर्वक बिता सकते हैं | अपनी जिम्मेदारी को दूसरों पर डालकर हम कभी भी अपने आप में परिवर्तन नहीं ला सकते हैं , और न ही बदलने की शुरुआत कर सकते हैं | ऐसा केवल वही लोग कर पाते हैं , जो अपने दुखों का कारण बाहर नहीं बल्कि अपने अंदर ही खोज लेते हैं | ऐसा कर पाने के बाद ही उन्हें उसमें सुधार करने का पर्याप्त अवसर मिल पाता है | अतः परिस्थितियों को नहीं मनःस्थिति को बदलने का प्रयास करना चाहिए | जैसे ही मानव अपना इसके अनुरूप अपना दृष्टिकोण बदलता है , तथा उसी के अनुसार प्रयास करता है , तब ही उसके जीवन में समाधान स्वयं प्रस्तुत हो जाता है | इसके पश्चात उसे अपने जीवन में सुख और दुख दोनों एक सिक्के के पहलू दिखाई पड़ने लगते हैं | उसे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि प्रत्येक मानव के जीवन में जितना आवश्यक सुख है , उससे भी आवश्यक दुख है | ऐसा करने के बाद ही उसे अपने जीवन में स्थाई रूप से संतोष मिल पाता है |


इति श्री

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