Skip to main content

[ B/12 ] माता की प्रसन्नता से मिलती है मुक्ति

web - gsirg.com
माता की प्रसन्नता से मिलती है मुक्ति
मां भगवती की लीला कथा के अनुकरण से शिवसाधक को कई प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं , जैसे शक्ति , भक्ति और मुक्ति आदि | माता की लीला कथा का पाठ करने से ही शक्ति के नए नए आयाम खुलते हैं | यह एक अनुभव की बात है | आदिकाल से ही माता के भक्तजन इस अनुभव को प्राप्त करते रहे हैं , और आगे भी प्राप्त करते रहेंगे | भक्तों का ऐसा मानना है , कि शक्ति प्राप्त का इससे सहज उपाय अन्य कोई नहीं है | इसके लिए दुर्गा सप्तशती की पावन कथा का अनुसरण करना होता है , जो लोग धर्म के मर्मज्ञ हैं तथा जिनके पास दृष्टि है केवल वही लोग इस सत्य को सहज रूप में देख सकते हैं |
दुर्गा सप्तशती का पाठ
माता की भक्ति करने वालों के जानकारों का विचार है , कि माता की शक्ति प्राप्त का साधन , पवित्र भाव से दुर्गा सप्तशती के पावन पाठ करने पर ही प्राप्त हो सकता है | इस पवित्र और शक्ति दाता पावन कथा का प्रचार केवल धरती पर ही नहीं , अन्य लोको में भी है | इस पावन कथा का पाठ और अनुष्ठान लोक लोकांतर में भिन्न भिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है | इसके पाठ से अवरोधों का नाश , विघ्न बाधाओं से छुटकारा और नवसृजन का प्रारंभ होता है | जो भी साधक इस पाठ को पवित्र और भावना भरे मन से करता है तथा माँ भगवती का चिंतन करता है , माता उन्हें निश्चित रूप से अपनी शक्ति का वरदान देती हैं | यह सत्य किसी से छिपा नहीं है | इसको कई बार देखा और परखा भी जा चुका है , कि माता, अपने क्रोध से महाकाल , शंकर भगवान को भी विस्मित कर देने वाली आदिशक्ति माँ , केवल मां पुकारने से ही वरदायिनी और शीघ्र प्रसन्न होने वाली मां प्रसन्न हो जाती हैं |
मुक्ति दायिनी है मां
जिन असाध्य कार्यों को करने में स्वय स्वयं शंकर भगवान को सफलता नहीं मिल पाती है , उस कार्य को मां सामान्य जन की पुकार पर पूरा कर देती है | वास्तव में भक्ति की महिमा ही विचित्र है कि ममतामयी हैं | मां के इस ममतामयी रूप के बारे में ऐसी धारणा है | माता की शक्ति का अनुभव तथा लाभ तो सभी को मिल सकता है परंतु भक्ति मिलना आसान नहीं है | क्योंकि माता की भक्ति केवल उन्हीं को मिलती है जिनका अंतःकरण शुद्ध तथा चिंतन परिष्कृत होता है | भक्ति भाव से भरे साधक मां की सबसे प्यारी संतान होते हैं , इसीलिए मां स्वयं अपने तथा पवित्र और अंतःकरण के भाव से भरे ह्रदय वाले साधकों के बीच , कोई भेदभाव नहीं करती हैं | माता की भक्ति करने वाला साधक चाहे जिस लोक का निवासी हो , चाहे जिस जाति का हो अथवा किसी का पुत्र अथवा पुत्री हो माँ उससे कोई भेद नहीं करती हैं | वह तो केवल भक्तों की आर्त पुकार पर, उसे अपनी भक्ति का वरदान दे देती हैं |
विधि विधान का बंधन नहीं
करुणामयी माता अपनी प्रसन्नता से सभी को मुक्ति का वरदान देती हैं | यह वरदान मिल जाने पर भक्त के सभी जटिल कर्मबंधन तथा कठिन कष्ट और असाध्य रोग आदि समाप्त हो जाते हैं | प्रत्येक देवी देवता की अनेकों साधनाएं हैं , अनगिनत साधन है और सभी का एक निश्चित विधि विधान का प्रारूप है | लेकिन आदिशक्ति माता की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार के विशेष विधि विधान साधना या साधन की आवश्यकता नहीं है | माता तो विधि-विधानों और विज्ञान से ऊपर उठकर अपनी कृपा और प्रसन्नता भक्तों को उपहारस्वरूप में स्वयम प्रदान करती हैं | अगर किसी प्राणी ने अनेक जन्म तक मां की की साधना की हो तो वह प्राणी माँ की कृपा से परम गति को प्राप्त होता है | उसे अपने आप ही मुक्ति मिल जाती है | इसके लिए उसको अनेक जन्मों की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है |
स्मरण और अनुभूति
जैसा की प्रारंभ हमें बताया जा चुका है कि आदिशक्ति माता को प्रसन्न करने के लिए किसी विशेष विधि विधान या विज्ञान की आवश्यकता नहीं है | तब प्रश्न यह उठता है कि माता की प्रसन्नता कैसे प्राप्त की जाए | इसके लिए भक्त या साधक को बस माता के साथ अपने नैसर्गिक सहज संबंधों के स्मरण की अनुभूति की आवश्यकता होती है | क्योंकि माता तो संपूर्ण संसार की माता है , और विश्व के सभी प्राणी उनकी प्रिय संतान हैं , इसलिए मां को प्रसन्न करने के लिए केवल उनका शुद्ध अंतकरण से स्मरण की अनुभूत करना ही पर्याप्त है | क्योंकि वह जगत माता है और माता कभी भी अपनी संतान का अहित नहीं करती है , सदा उसका कल्याण करती है | इसीलिए वह प्रसन्न होकर अपनी संतानों को मुक्ति का प्रसाद प्रदान करती हैं |
त्रिकाल त्रिबारं सत्य
आदिशक्ति माता स्वयं सृष्टि भी हैं और सृष्टा भी है | अखिल विश्व में जितनी भी रचनाएं , रचनाकार , सृजन और सृजेता हैं सभी कुछ माताजी ही हैं | वह प्रत्येक ब्रम्हाण्ड के सभी रहस्य को जानती हैं , क्योंकि विश्व के सारे रिश्ते उन्हीं से जन्मे हैं | जो भी है और जहां भी है उसको वह उसी तरह स्वीकार कर लेती हैं | इसीलिए उनको प्र्शन्न करने का किसी तरह का विधि विधान या विज्ञान नहीं है , तथा उनके जो भी प्रभाव और परिणाम है इन सब की जन्मदात्री माता जी ही हैं | इसीलिए इस तथ्य से परिचित भक्त या साधक किसी भी विधि विधान में नहीं पड़ते हैं | वह तो केवल एकाक्षरी मंत्र ''मां '' को शुद्ध अंतकरण से स्मरण करने लगते हैं , और उनकी शरण में चले जाते हैं | यह तो सत्य ही है कि शरणागत में आए हुए पुत्र को मां उन्हें अपना प्रसाद प्रदान करती हैं , तथा दुनिया की भव तथा बाधाओं से मुक्त कर , मुक्ति का वरदान प्रदान कर देती हैं |
आदिशक्ति माता मैं ही साधना में ही विश्व के गहन रहस्य समाए हैं | यह परम् वतस्ला माता ही पराविद्या , संसार बंधन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी है | जनसामान्य केवल मां के एकाक्षरी मंत्र '' माँ '' का पवित्र हृदय श्रद्धा से स्मरण कर उनकी प्रसन्नता का प्रसाद प्राप्त कर , इस संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है |
इति श्री
web- gsirg.com

Comments

Popular posts from this blog

पुराने बीजो का संरक्षण

नये खाद्यान्न बीजों या शंकर बीजों के आगमन के साथ खाद्यान्नों का उत्पादन अवश्य बढ़ा है।जिसके लिए हमारे कृषि वैज्ञानिक अवश्य ही बधाई के हकदार हैं।आज हम सवा अरब से अधिक लोगों को भरपेट भोजन देनें के अलावा निर्यात भी कर रहे हैं।जिस कारण हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष प्राप्त हो रहा है।लेकिन भारतीय किसानों द्वारा अन्धाधुंध यूरिया और अन्य उर्वरकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग के कारण कुछ देशों का बासमती चावल के आर्डर वापस लेना पड़ा है।जिसके कारण हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी है।जो अवश्य ही चिन्ता का विषय है।कृषि वैज्ञानिकों द्वारा मृदा जांच द्वारा किसानों को प्रशिक्षित कर आवश्यक रसायनों के प्रयोगों के लिए किसानों को प्रशिक्षित किए जानें की आवश्यकता है।     हमारे पुराने जमाने के किसानों द्वारा पुराने बीजों एवं गोबर की खाद तथा खली से उत्पादित खाद्यान्नों एवं सब्जियों में जो गजब का स्वाद एवं सुगंध मिलती थी वह अब नये बीजों एवं उर्वरकों एवं कीटनाशकों से उत्पादित खाद्यान्नों एवं सब्जियों में नहीं पाई जाती है।वह स्वाद,सोंधापन, सुगंध अब धीरे-धीरे गायब होती …

कबिरा शिक्षा जगत् मा भाँति भाँति के लोग।।भाग दो।।

प्रिय पाठक गणों आपने " कबीरा शिक्षा जगत मां भाँति भाँति के लोग ( भाग-एक ) में पढ़ा कि श्रीमती रामदुलारी तालुकेदारिया इण्टर कालेज सेंहगौ रायबरेली की प्रधानाचार्या, प्रबंधक, लिपिकों आदि के द्वारा किस प्रकार शिक्षा सत्र 2015--16 तथा शिक्षा सत्र2014--15 मे किस प्रकार लगभग उन्यासी छात्रों को फर्जी ढ़ंग से प्रवेश दिलाया गया । बाद मे इन्हीं छात्रों को अगले वर्ष इण्टर कक्षा की परीक्षा दिला दी गई। इसके लिए फर्जी कक्षा 12ब3 बनाई गई। बाकायदा फर्जी छात्रों का उपस्थिति रजिस्टर भी बनाया गया। परन्तु सभी छात्रों से प्रथम तथा द्वितीय वर्ष की कक्षाओं मे निर्धारित विद्यालय फीस लेने के बावजूद भी इसका विद्यालय के रजिस्टर पर इन्दराज नही किया गया। यह अनुमानित फीस लगभग साढ़े चार लाख रुपये के आसपास थी जिसे उपरोक्त अधिकारियों / विद्यालय के शिक्षा माफियाओं द्वारा अपहृत / गवन कर लिया hi गया। यथोचित कार्रवाई हेतु इस सम्पूर्ण विवरण को प्रार्थना पत्र मे लिखकर अपर सचिव के क्षेत्रीय कार्यालय इलाहाबाद को दिनाँक 25 /05 2016 को भेजा गया।
अब हम आपको इसके शर्मनाक पात्रों का परिचय करवा देते हैं।
       😢शर्मनाक…