Skip to main content

[ f/1 ] माता के समान है परमात्मा

web - gsirg.com

माता के समान है परमात्मा

हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार आत्मा अजर अमर है। आत्मा को किसी भी प्रकार मिटाया नहीं जा सकता है। इस संबंध में आज का विचारणीय विषय है कि , आत्मा और परमात्मा के बीच क्या संबंध है। हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवात्मा और परमात्मा का संबंध एक बेटे और मां की तरह का होता है। जिस प्रकार से एक पुत्र अपनी मां की कोख में पालन पोषण और विकास पाता है। बिल्कुल इसी तरह हमारी जीवात्मा का अंकुरण , विकास और उसका अस्तित्व सभी कुछ परमात्मा से ही तो होता है। प्रत्येक जीवआत्मा का हर रूप उसी ईश्वर के सागर रूपी लहरों की और तरंगों की तरह होता है। परमात्मा के प्रभाव से ही प्राणी में निहित आत्मा पल्लवित , पुष्पित और खिलती रहती है |

संबंधों में प्रगाढ़ता

जिस प्रकार से इस संसार की हर माता का उसके बेटे के साथ गहरा संबंध होता है। ठीक उसी प्रकार प्राणी की जीवआत्मा का संबंध भी परमात्मा से होता है। विराट पुरुष के रुप में परमात्मा ही हमारी मां के समान मानी गई है। जिस प्रकार से मां का अपने पुत्र के साथ भावनात्मक संबंध होता है , ठीक उसी प्रकार जीवात्मा का संबंध भी परमात्मा से ही होता है।

भावना की सघनता और व्यापकता


भावना की सघनता और व्यापकता ही ममता का रूप धारण करती है। जिसप्रकार एक मां के हृदयस्थल में उमड़ी हुई ममता , पुत्र पर सावन की घटा बनकर निरंतर प्रेम , घनिष्ठता और लगाव का संबंध मजबूत करती रहती है। ठीक इसीप्रकार परमात्मा की यह ममता , जीवात्मा पर सदैव अपना प्रेम लुटाने के लिए आतुर रहता हैं। इसी से जीवात्मा को सर्वांगीण रूप से पोषण मिलता रहता है। जिससे उसका अनवरत विकास होता रहता है। परमात्मा का यह प्रेम कभी नहीं चुकता बल्कि जीवात्मा को सतत मिलता ही रहता है।

सतत प्यार और पोषण लुटाते रहना और भावना के संबंध

मां और बेटे के बीच उपरोक्त गुण सदैव अटूट ही रहते हैं। यही कारण है कि दोनों मे जैविक संबंध सदा ही मजबूत बने रहते हैं। ठीक इसी के अनुरूप परमात्मा और जीवात्मा के संबंध भी एक दूसरे से एक मजबूत जोड़ से जुड़े रहते हैं। यदि परमात्मा को लगता है कि, उसने जीवात्मा को जो सब कुछ प्रदान किया ही है। फिर भी यदि कुछ देना शेष होता है , तो वह भी बिना किसी दुराव या छिपाव के उसे भी देने को सदैव तैयार रहता है। अगर संबंधों में भावना की न्यूनता हो जाए , तब थोड़ा सा भी कष्ट परमात्मा को असहनीय प्रतीत होने लगता है। जिसके यथोचित निराकरण के लिए वह , हर प्रकार के कष्टों को स्वयं अपने ऊपर लेकर , जीवात्मा को सुखी रखने का प्रयास करता है।

अद्भुत अनुभूति

जब कोई मां अपने बच्चे को जन्म देती है। उस समय उसे एक अद्भुत अनुभूति होती है। उसे लगता है कि जैसे उसके शरीर का कुछ अंश बाहर आ गया हो। ठीक इसी प्रकार जीवात्मा जब किसी शरीर में प्रवेश कर जाती है तब परमात्मा को एक अद्भुत अनुभूति होती है। अनुभूत के यह सूक्ष्म तंतु और सूक्ष्म संवेदनाएं एक दूसरे को आपस मे मजबूती के साथ जोड़ें रहती हैं। इस पर काल , स्थान , गति और स्थिति का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है। क्योंकि इसमें भावनाओं और सम्वेदनाओं की गहरी सघनता विद्यमान होती है। दोनों के बीच कोई विभेदक और विभाजक दीवार खड़ी नहीं की जा सकती है , क्योंकि दोनों ही अलग अलग न होकर एक ही होते हैं। ऐसे में दोनों के बीच भेद करना असंभव हो जाता है।

परमात्मा हृदय हीन नहीं

जिस प्रकार से प्रत्येक प्राणी को अपने जीवन में सुविधा और आनंद का भरपूर मौका मिलता है। ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी जीवात्मा को यह अवसर प्रदान करती है। इसमें यदि कहीं कोई भी अवरोध उत्पन्न होता है तो , उसका कारण हम स्वयं ही हैं। हमारे द्वारा ही कुछ गड़बड़ी कर दी जाती है , जिसके कारण जीवन में दुख , कष्ट और परेशानियां आने लगती है

परंतु परमात्मा के अंदरहृदयहीनता होती ही नहीं है , इसीलिए जब हमारे अंदर विद्यमान जीवात्मा उसे माता - माता कह कर , परमात्मा को पुकारती है। तब परमात्मा उसके कष्ट के हरण के लिए संवेदित होकर उसकी पीड़ा दूर करने के लिए प्रयासरत हो जाता है। जिस प्रकार से कष्ट होने पर पुत्र अपनी मां को पुकारता है और माता उसके कष्ट उनके हरण के प्रयास करती है , ठीक उसी प्रकार शरीर में स्थित जीवात्मा जब परमात्मा को पुकार करती है तब वह उसके कष्ट हरने के सभी प्रयास कर , उसका भविष्य सुखमय बना देता है।

इति श्री

web - gsirg.com

Comments

Popular posts from this blog

कबिरा शिक्षा जगत् मा भाँति भाँति के लोग।।भाग दो।।

प्रिय पाठक गणों आपने " कबीरा शिक्षा जगत मां भाँति भाँति के लोग ( भाग-एक ) में पढ़ा कि श्रीमती रामदुलारी तालुकेदारिया इण्टर कालेज सेंहगौ रायबरेली की प्रधानाचार्या, प्रबंधक, लिपिकों आदि के द्वारा किस प्रकार शिक्षा सत्र 2015--16 तथा शिक्षा सत्र2014--15 मे किस प्रकार लगभग उन्यासी छात्रों को फर्जी ढ़ंग से प्रवेश दिलाया गया । बाद मे इन्हीं छात्रों को अगले वर्ष इण्टर कक्षा की परीक्षा दिला दी गई। इसके लिए फर्जी कक्षा 12ब3 बनाई गई। बाकायदा फर्जी छात्रों का उपस्थिति रजिस्टर भी बनाया गया। परन्तु सभी छात्रों से प्रथम तथा द्वितीय वर्ष की कक्षाओं मे निर्धारित विद्यालय फीस लेने के बावजूद भी इसका विद्यालय के रजिस्टर पर इन्दराज नही किया गया। यह अनुमानित फीस लगभग साढ़े चार लाख रुपये के आसपास थी जिसे उपरोक्त अधिकारियों / विद्यालय के शिक्षा माफियाओं द्वारा अपहृत / गवन कर लिया hi गया। यथोचित कार्रवाई हेतु इस सम्पूर्ण विवरण को प्रार्थना पत्र मे लिखकर अपर सचिव के क्षेत्रीय कार्यालय इलाहाबाद को दिनाँक 25 /05 2016 को भेजा गया।
अब हम आपको इसके शर्मनाक पात्रों का परिचय करवा देते हैं।
       😢शर्मनाक…

[ q/9 ] Tratamentul; O alternativă unică la sterilizare

web - gsirg.com

 Tratamentul; O alternativă unică la sterilizare

 Fiecare creatură din lume care a venit în această lume, el a câștigat definitiv copilarie, adolescenta, maturitate si batranete | Dintre acestea, dacă părăsim copilăria, atunci în fiecare etapă a vieții, fiecare creatură suferă de dorința sexuală. Cu excepția unui om determinat generație apel la alte creaturi, dar omul este o ființă care, în 12 luni ale anului, 365 de zile, 24 de ore, poate cicălitoare sex în orice moment | Cea mai dificilă sarcină a ființelor umane în această lume este să câștige "Cupid". Fiecare bărbat și femeie din această lume este absorbit de toți muncitorii și începe să facă nenorociri teribile în această lume. Se estimează că doar 70% din criminalitatea mondială este legată de acest lucru.


 Libido o tulburare puternică


  Cauza nașterii diferitelor tipuri de infracțiuni este dorința. Femeile și bărbații care suferă de această dorință sexuală nu ezită să facă diferite tipuri de crime în ac…

सजा

web - gsirg.com


सजा
एक प्रतीकात्मक क्षेपक जो आपकी सोंच बदल देगा
⧭किसी स्थान पर एक बहुत ही प्रसिद्ध महात्मा रहा करते थे |उनकी ख्याति उस क्षेत्र के आसपास फैली हुई थी |ज्ञानी , धार्मिक और विद्वान होने के कारण , उस क्षेत्र के कई जिज्ञासु पुरुष , उनके शिष्य बन गए | उनके शिष्यों में एक शिष्य ने , अपने गुरु के आशीर्वाद से , जब सभी प्रकार की शिक्षाएं प्राप्त कर ली , तो गुरु की आज्ञा प्राप्त कर , वह जन कल्याण के लिए बाहर भ्रमण की सोचने लगे | गुरुजी ने उनके मन में छिपी परोपकार की भावना को जानकर , उन्हें अपने आश्रम से सहर्ष , आशीर्वाद देते हुए खुशी खुशी अन्यत्र भ्रमण करने की इजाजत दे दी | गुरु की आज्ञा पाकर महात्मा जी देशाटन को निकल पड़े | एक जगह पर मनोरम स्थान देखकर , उन्होंने एक कुटिया बना ली | महात्मा जी ज्ञानी पुरुष तो थे ही इसलिए उनकी भी प्रशंसा चारों को फैल गई |

⧭महात्मा जी की कुटिया के पास के एक गांव में एक वृद्ध महिला रहती थी | एक समय उसका बेटा बहुत बीमार पड़ गया | उस बुढ़िया ने अपने बेटे की हर संभव चिकित्सा की , परंतु उसे कोई लाभ नहीं मिला | तब गांव वालों ने उ…