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[ p/1 ] धर्म वैराग्य की चरम अवस्था है विवेक

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धर्म वैराग्य की चरम अवस्था है विवेक

धार्मिक क्षेत्र में प्रसिद्धि पाने वाले अनेक विद्वानों को ,जनसामान्य के लोग बहुत ही निकटता से जानते थे |जनसामान्य का विचार था कि ऐसे विद्वान लोगों की ज्ञान की परिधि संसार के ज्ञात अज्ञात सभी रहस्यों को अनावृत करने में सक्षम थी यही कारण था कि उन लोगों को संसार का कोई भी रिश्ता उन्हें अपने बंधन में बांधने में सफल नहीं हो पाया था इसके बावजूद भी प्रकृति की किसी भी गुण की कैसी भी गति उनकी दृष्टि से ओझल नहीं थी यदि हम इसे संक्षेप में करना चाहे तो उन्हें आज के युग का ऋषि करना पर्याप्त होगा |

विवेक वैराग्य और मोक्ष के बीच संबंध

अगर सरसरी निगाह से देखा जाए तो देखने में तीनों ही अलग-अलग प्रतीत होती हैंपरंतु तीनों के बीच ठीक वैसा ही संबंध है जैसा जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के बीच होता है जैसा कि सभी जानते हैं कि एक बालक ही परिपक्व होकर युवा बनता है और बाद में इसी परिपक्वता के साथ उसके जीवन में प्रौढ़ता भी आती है इसप्रकार बालपनयुवा और प्रौढ़ता एक व्यक्ति के जीवन की आने वाली विभिन्न अवस्थाएं तो हैं परंतु वह तीन व्यक्ति नहीं है ठीक इसीप्रकार वैराग्य को मोक्ष की पहली दिशा का पहला चरण माना जा सकता है इस वैराग्य की पराकाष्ठा विवेक के रूप में होती है तथा विवेक की चरम अवस्था भी मोक्ष के रूप में प्रकट होती है यदि इन तथ्यों को विस्तार से समझना हो तो सर्वप्रथम वैराग्य विवेकऔर मोक्ष को अलग अलग समझ लेना आवश्यक हो जाता है इसके बाद में ही इनके बीच के संबंध को ठीक से समझा जा सकता है |
वैराग्य
वैराग्य से अभिप्राय विषयों से मुक्ति है यह तो सर्वविदित है कि हमारी इंद्रियां ही विषयों के प्रवेश का द्वार तो अवश्य है परंतु विषयों में पैदा हुई आसक्ति का कारण नहीं है जब इस दुनिया के सांसारिक प्राणी यह विश्वास करने लगते हैं कि इस संसार की कोई भी वस्तुव्यक्ति या विषय उनके लिए सुख का माध्यम हो सकते हैं तब ही वे एक प्रकार से रागी और उन विषयों से लिप्त पुरुष बन जाते हैं परन्तु जिस समय उन्हें इस संसार की नश्वरता का ,  इसकी’क्षणभंगुरता का ज्ञान हो जाता है , तब उसको यहां का कुछ भी , हमारी चेतना में किसी तरह का आकर्षण नहीं पैदा करता है | इस आकर्षण से मुक्त होने की अवस्था को ही वैराग्य कहा जाता है | इसीप्रकार भी समझा जा सकता है कि , संसार संसार के गुण सभी तत्वों से जिनसे संसार के प्रति आकर्षण पैदा होता है , उसमें अगर विकर्षण का भाव पैदा हो जाए तो यह विकर्षण ही वैराग्य है |

 वैराग्य सामान्य व्यक्ति और महामानव सभी को हो सकता है जब भी थोड़ी देर के लिए ही सही , विकर्षण की स्थिति पैदा हो जाती है तब ही वैराग्य की स्थिति बन पाती है  जब कोई व्यक्ति श्मशान घाट पहुंचता है तब , वहां खड़े होकर उसे संसार की नश्वरता का ज्ञान हो पाता है , परंतु घर लौटते ही उसका मन फिर से इन्ही सांसारिक प्रपंचों में लग जाता है | जिसे केवल वैराग्य ही दूर कर सकता है |

 विवेक

हर मनुष्य को संसार के आकर्षण बहुत ही प्रिय होते हैं | संसार का कोई भी पुरुष बड़ी कठिनाई से इन आकर्षणों से मुक्त हो पाता है | यह संसार एक प्रकार से फूलों से ढका हुआ मृत शरीर है , परंतु जब इन फूलों को हटा दिया जाता है | केवल तब ही इसकी असलियत सामने आ पाती है | सृष्टि का यथार्थ यही है वैरागी पुरुष संसार को स दृष्टि से नहीं देखता | वैराग्य का दीपक जलते ही प्राणी उससे दूर नहीं हटना चाहता है | क्योंकि तब उसके अंदर ऐसा दृढ भाव आ जाता है , जिसे संसार का कोई भी वैभव डगमगा नहीं सकता | ऐसी स्थिति में उसके अंदर जिस बोध का जन्म होता है , उसे देख कर ही , संसार सही विकर्षण के बाद भी , हमारे पूर्वकृत कर्म और संस्कार हमारे इस संसार में रहने का कारण तो बनते हैं | परन्तु विवेक उस पथ से उसको ऐसे निकाल कर ले जाता है | जैसे अंधेरे मार्ग पर अचानक सूर्य का प्रकाश आने लगा हो | संक्षेप रूप में संसार की सच्चाई का बोध ही विवेक है |

 मोक्ष

जीवन का सही ज्ञान , जीवन जीने में आता है मोक्ष का अर्थ है -  संसार में आवागमन से मुक्ति | इ संसार में प्रत्येक प्राणी का आवागमन केवल इस आकर्षण के कारण होता है , कि संसार उसे सुख प्रदान कर सकता है , और वैराग्य से चिंतन की मुक्ति
.
परंतु चिंतन की मुक्ति , संस्कारों को क्षीण नही कर पाती है व्यक्ति को चिंतन से मुक्ति तो केवल विवेक ही दिला सकता है | विवेक और सम्यक बोध जिस पुरुष के पास होते हैं , वही मुक्त आत्मा हो पाता है | जिसप्रकार  कांच से धूल की परत  हटते ही सब कुछ साफ साफ दिखाई पड़ने लगता है | उसी प्रकार मनुष्य के विवेकचक्षु खुलते ही वैराग्य का वेग ,  उसे सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त कर देता है | इसे इसप्रकार से भी समझा जा सकता है कि , वैराग्य की पराकाष्ठा विवेक है , और विवेक की पराकाष्ठा मोक्ष है |

उपसंहार

जिस समय कोई पुरुष वैराग्य , विवेक और मोक्ष के संबंध में पूरी जानकारी पा लेता है , तथा उन पर अनुसरण करने का उद्देश्य बना लेता है | तब उसके अंदर एक नए प्रकार का उत्साह जन्म लेता है | जब तक उसे यह ज्ञान नहीं मिलता , तब तक उसकी जीवन जीने की दृष्टि भी नहीं मिलती है | परन्तु ज्ञान प्राप्त होते ही उसके संकल्प सुदृढ़ होने लगते हैं | जिससे उसकी जीवन के प्रति उसकी सोच की दृष्टि और उसके संकल्पों में बदलाव आ जाता है | अत सर्वसाधारण के लिए यह जानना अति आवश्यक है कि , जिसने भी वैराग्य , विवेक और मोक्ष के अंतर्संबंधों को जान लिया | और उसका अनुसरण किया है , उसे ज्ञात हो जाता है कि , वैराग्य की पराकाष्ठा विवेक ही है |

इति श्री

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