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12 धर्म ; दर्पण

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धर्म ; दर्पण

दर्पण अर्थात चेहरा देखने वाला शीशा | हर एक घर में एक दर्पण अवश्य होता है , जिससे लोग अपना प्रतिबिंब देखते हैं | भौतिक संसार में इसे हम एक वैज्ञानिक यंत्र कह सकते हैं | लेकिन जब हम इसका अर्थ धार्मिक क्षेत्र में लेते हैं , तब इसका अर्थ बहुत ही विस्तृत हो जाता है | धार्मिक क्षेत्र में दर्पण केवल एक कांच की संरचना ही नहीं है , बल्कि मानव मन के लिए संसार की संरचना एक दर्पण ही है | जिसमें हम अपने मन की नजरों से अपने तथा दूसरों के प्रतिबिंब का दर्शन कर पाते हैं , क्योंकि मन का अपना प्रतिबिंब ही संसार में झलकता है | अगर हम वास्तव में एक अच्छे इंसान हैं , तब हमें सारा संसार अच्छाइयों से भरा दिखाई पड़ता है | किंतु हमारे बुरे होने पर , यह संसार बुराइयों का घर दिखाई पड़ने लगता है | इसको इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि , मन के अनुरूप ही संसार में प्रतीतियाँ और अनुभूतियां पाई जाती है , अर्थात जो कुछ मानव मन में नहीं है उसे संसार में देख पाना कठिन ही नहीं असंभव होता है | जिस प्रकार हम शीशे में अपना ही प्रतिबिंब देख पाते हैं परन्तु दूसरे का नहीं | इसका कारण है कि जो होता नहीं है , वह दर्पण में दिखाई भी नहीं देता है | हमारे मन का धार्मिक स्वरूप भी बिल्कुल ऐसा ही है |


इस संबंध में गुरु नानक की एक कथा प्रचलित है | इस कथा के अनुसार एक बार गुरु नानक अपने शिष्य मर्दाना के साथ भ्रमण करते करते एक गांव में पहुंचे | गांव तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें काफी रात हो गई | रात बिताने के लिए आश्रय की खोज मे जब यह गांव के लोगों के पास गए तब वहां के निवासियों ने , उन्हें गांव में रुकने नहीं दिया | गांव वालों ने उन्हें गांव से भगा दिया , जिसके कारण उन्हें अपने शिष्य के साथ सारी रात एक पेड़ के नीचे गुजारनी पड़ी | रात बीतने के बाद गुरु नानक जब उस गांव से प्रस्थान करने लगे तो , उन्होंने गांव वालों को आशीर्वाद दिया कि , आप सभी लोग किसी गांव मेही रहे , फूले फले और सुखी रहें | यह मेरी कामना है | इसके बाद गुरुजी अपने शिष्य के साथ दूसरे गांव की ओर चल दिए |


दूसरे दिन भ्रमण करते करते हैं गुरु नानक जी रात्रि के समय एक दूसरे गांव पहुंचे तब तक रात काफी हो गई थी , इसलिए आश्रय की खोज मे वह उस गाँव के लोगों के भी गांव पहुंचे | तब उस गांव वालों ने उनका बहुत आदर किया , उन्हें भोजन कराया , बिस्तर दिया तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सारे प्रबंध कर दिए | गुरु जी और उनके शिष्य मर्दाना की वह रात बड़े ही आराम से बीत गई | प्रातः भोर होने पर जब गुरुजी गांव से चलने लगे , तब उन्हों ने गांव वालों को आशीर्वाद दिया कि , आप लोग फूलो फलो , खुशी रहो , परंतु इस गांव में न रहकर सारे भू भाग पर बिखर जाओ |


गुरु जी के इन वाक्यों को सुनकर उनका शिष्य मर्दाना बहुत ही व्यथित हुआ | उसने गुरुजी से कहा - जिन गांव वालों ने आपको रात में रुकने के लिए असुविधा दी उनके लिए आप एक ही स्थान पर रहने का आशीर्वाद देकर आए थे | परंतु जब इस गांव के लोगों ने आपका अत्यंत सम्मान किया , आपको सुख , सुविधाएं प्रदान की , तो आप इन लोगों को इस गांव से दूसरे गांव चले जाने का अभिशाप क्यों दे रहे हैं ? गुरु नानक मुस्कुराए और बोले - यह दुनिया जैसी है उसको वैसा ही मिलना चाहिए | पहले गांव के लोगों ने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया | यदि वे पूरे भूभाग पर फ़ैल गए तो सारी दुनिया को अपनी गंदगी से गंदा कर देंगे | इसलिए मैंने उन्हें उसी गांव में रहने का आशीर्वाद दिया | परंतु इस गांव के लोगों ने हमारा आदर सत्कार किया , सम्मान किया , हमें सुख सुविधाएं प्रदान की | इससे प्रतीत होता है कि इस गांव के लोग बहुत ही अच्छे हैं | अगर यह दुनिया के दूसरे भू भाग पर गए तो वहां पर अच्छाई ही फैलाएंगे | इसलिए हमने इस गांव वालों को अलग भूभागों मे चले जाने को कहा है | गुरु नानक जी की इन बातों को सुनकर उनका शिष्य मर्दाना गुरुजी के मर्म को जान गया |


यह तो मात्र एक कथा है , परंतु यदि हम अपने मन के दर्पण में झांक कर देखें , तब पाते हैं कि , गुरु नानक जी ने दोनों गांव के लोगों को दर्पण ही तो दिखाया है | संकेत रूप में उन्होंने गांव वालों को बताया है कि वास्तव में वे लोग जैसे हैं , उनको वैसे ही होना चाहिए , तथा उन्हें परिणाम भी वैसा ही मिलना चाहिए | जिस प्रकार से दर्पण में '' जो जैसा होता है वैसा ही दिखता है '' ठीक उसी प्रकार गुरु जी ने भी गांव वालों को दर्पण ही दिखाया था | उन्होंने एक गांव के लोगों के बारे में नहीं बल्कि दो विपरीत विचारधारा वाले गांव की व्यक्तियों के बारे में विरोधी गुण पाकर ही विरोधी बातें कही हैं |


यह संसार एक दर्पण है | हम इस दर्पण मे दूसरों उनका अपना ही प्रतिबिंब भी सच्ची नजर से देख लेते हैं | हमें अपनी नजर में जो बुरा लगता है , उसे बुरा समझते हैं , और जो अच्छा लगता है उसे अच्छा ही समझते हैं |

इस मन रूपी दर्पण में जब हम अपने मन के भावों से देखते हैं तभी हमे इस संसार के लोगों की गुण और दोषों की जानकारी हो पाती है | यदि हमारी नजर सर्वश्रेष्ठ है , तभी हम अपने मन के दर्पण में लोगों की भलाइयां और बुराइयां देख पाते हैं | यदि हमारे मन पर संसार की गंदगियों का लेप चढ़ा होगा , तब हम संसार की बुराइयां और भलाइयाँ नहीं देख पाते हैं | इसीलिए प्रत्येक आदमी को चाहिए कि सबसे पहले वह अपने मन को शुद्ध पवित्र और अच्छा बनाए , क्योंकि इसके बाद ही उसे अपने मन के दर्पण में अपना और दूसरों का असली प्रतिबिंब देखने का मौका मिलता है | जब तक सर्वत्र सत्य , शिव और सुंदर के दर्शन न होने लगे , तब तक व्यक्ति को यह जान लेना चाहिए कि , स्वयं उसके अंदर कोई खोट अवश्य है | ऐसा हो जाने पर उसे अपने मन की कालिमा और दुर्गुणों को दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए , क्योंकि ऐसा करने पर ही हमारे मन का दर्पण साफ स्वच्छ और पारदर्शी हो सकेगा | ऐसा हो जाने पर ही उसे सच्चे रूप मे सफलता , अमरता और लोकप्रियता मिल सकेगी |


इति श्री

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