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धर्म ; तुम वही ही हो

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धर्म ; तुम वही ही हो
प्रत्येक मानव आदि काल से ही यह जानने का इच्छुक रहा है कि वह क्या है तथा इस संसार मे किसलिए आया है | इन सभी को जानने के लिए वह विद्वानों , ऋषि-मुनियों और योगियों के संपर्क में जाता रहता है | तथा सदा ही अपने को जानने का प्रयास करता रहता है | काफी प्रयासों के बाद उसे ज्ञात होता है ,कि वह तो स्वयं ही परमात्मा का अंश है | यह जान लेने के पश्चात ''तुम वहीं ही हो '' वाक्य उसके लिए बहुत ही सारगर्भित हो जाता है | यह बात तो उसके के समस्त आध्यात्मिक ज्ञान और अनुभव का सार है | प्रत्येक मानव को ज्ञानीजन यह बताते रहते हैं , कि इस तथ्य पर चिंतन और मनन करने की जरूरत होती है |
ज्ञान की प्राप्ति
ज्ञान की प्राप्ति भीएक ऐसा सच है जिस को जानने की बहुत अधिक आवश्यकता होती है | इसका कारण है कि बहुत से लोग इस ज्ञान को जान ही नहीं पाते हैं | जिन लोगों को आत्मज्ञान हो पाता है या फिर जिन्होंने ईश्वर से साक्षात्कार किया है , केक्ल वही लोग इसे जान पाते हैं | साधारणतः ऐसा देखा गया है कि बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो इस परम ज्ञान को प्राप्त ही नहीं कर पाते हैं | ऐसे लोग परम ज्ञान से विमुख रहकर किसी काल्पनिक आध्यात्मिक उपलब्धि के पीछे दौड़ते रहते हैं , और उसे ही पाने का प्रयास किया करते हैं |
उपलब्धि
उपरोक्त विवरण में ''उपलब्धि '' शब्द सकारात्मक शब्द है | जिन लोगों को अपने '' वही '' होने का जान प्राप्त हो जाता है | केवल वैसे ही लोग सांसारिकता से दूर ईश्वर के प्रिय हो जाते हैं | उनकी आत्मा निर्मल और वासनाओं से रहित हो जाती है | यह लोग अपने जीवन में उच्च कोटि के कार्य करते हुए दूसरों का हित भी करते रहते हैं | ऐसे लोगों को दूसरों का हित करने के बदले कुछ पाने की लालसा नहीं रहती है | इसके विपरीत जो लोग इस ज्ञान को नहीं प्राप्त कर पाते हैं | वह सांसारिक पुरुष हो जाते हैं , और भौतिक उपलब्धियों के पीछे भागते रहते हैं | यह लोग अपने प्रयास से भौतिक उपलब्धियों को प्राप्त भी कर लेते हैं और लोगों के बीच रहकर मान और सम्मान का जीवन भी बिताते हैं | संसार के दूसरे लोग इनकी प्रशंसा भी करते हैं तथा इनका सम्मान भी करते हैं | परंतु वास्तव में उनकी उपलब्धि ,सदैव आध्यात्मिक उपलब्धि के पीछे ही रहती है |
आध्यात्मिक उपलब्धि
     वास्तव में आध्यात्मिक उपलब्धी ही सर्वोत्तम है प्रत्येक मानव को चाहिए कि वह अपने जीवन में आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त करें ताकि उसका जीवन सर्वोच्च और महान बन सके | प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक है की वह इस उपलब्धी को पाने की कोशिश लगातार करता रहे हो सकता है यह उपलब्धि प्राप्त करने के लिए उसे कठिन से कठिनतम कठिनाइयों का सामना करना पड़े पर उसे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होना चाहिए उसे अपने मन से किसी वस्तु को पाने की इच्छा भी नहीं होनी या करनी चाहिए तथा इनका विचार भी नही मन में नही लाना चाहिए , क्योंकि ऐसे विचार सांसारिक पुरुषों के होते हैं उसे तो अपना पूरा ही जीवन ईश्वर को समर्पित कर देना होता है |
     आध्यात्मिक क्रांति 
    आध्यात्मिक उपलब्धि पाने के लिए आध्यात्मिक क्रांति की आवश्यकता होती है | ऐसा तभी संभव हो पाता है जब व्यक्ति अपने मन से हर तरह के लालच को छोड़ देता है उसके अंतर्मन में कुछ होने का अथवा कुछ पा लेने का विचार आना ही नहीं चाहिए केवल उसी अवस्था में ही आध्यात्मिक क्रांति संभव है | केवल सी समय हम  ‘’स्वयं हैं ही ‘’ की अवस्थापना हो पाती है इसके साथ ही  ‘’हम वही हैं ही ‘’का विचार पैदा हो पाता है वैसे तो इस धरती पर धर्म और अध्यात्म के नाम पर शोषण करने वाले लोग सदा ही रहे हैं उनका उद्देश्य लोगों को ठगना होता है ऐसे लोगों के लिए ‘’ कुछ हो जाना ‘’ या  ‘’कुछ कर पाना ‘’ एक स्वप्न के समान होता है | असल तथ्य का ज्ञान तो उसे अपने जीवन में कभी भी हो ही नहीं हो पाता है | वह यह सारी उम्र यह जान ही नही पाता है कि सत्य तो ‘’ हमारा होना ‘’ ही है | तथा तुम ही परमात्मा हो जिस समय व्यक्ति को यह ज्ञान हो जाता है कि वह तो खुद  ‘’वही ही है ‘’ |  ऐसी अवस्था के उपरांत ही उसके लिए समस्त संसार एक परिवार के रूप में परिलक्षित होने लगता है इस उपलब्धि को प्राप्त करने के बाद ही उसके मन की कुत्सित भावनाएं और लालसाएं इतनी क्षीण  हो जाती हैं  कि उसके लिए जाति भेद तथा धर्मभेद के विचार समाप्त हो जाते हैं उसके लिए इस संसार की समस्त सांसारिक उपलब्धियां बेकार हो जाती हैं केवल एक ही बात याद रहती है कि वह स्वयं ही ‘’ वही अर्थात परम तत्व परमात्मा है | इसके उपरांत उसका संपूर्ण जीवन उस ईश्वरीयसत्ता के समीप चला जाता है |
   
इतिश्री

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