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झोलाछाप डाक्टरों की व्यथा कथा / नेताओं की यौनलिप्सा मे संलिप्तता

झोलाछाप डाक्टरों की व्यथा कथा 

भारतीय समाज में यह जीव हमारे शहर,कस्बे, गांव देहात हर जगह पाया जाता हैं।एन-केन प्रकारेण यह जीव सरकार के स्वास्थ्य विभाग की प्रत्यक्ष सहायता करता हैं।सरकार इस बात को भी नहीं मान सकती क्योंकि सरकार की दृष्टि में यह जीव अस्तित्व में है ही नहीं।क्योंकि इनके पास बिचारों के भारतीय चिकित्सा परिषद द्वारा जारी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट नहीं होता।इसीलिए यह जीव कितना भी योग्य क्यों ना हो विधि मान्य चिकित्सक नहीं है।वैसे जन-जन तक स्वास्थ्य सेंवाएं पहुंचाने के कारण असली स्वास्थ्य रक्षक का श्रेय इसी जीव को जाता है।24घंटे चिकित्सा सेवाएं यहीं जीव देता है।लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सेवा देना इनका धर्म और कर्म दोनो है।एक तरफ सरकार सस्ती चिकित्सा सेवा देनें के लिए प्रतिबद्ध है इसी क्रम में प्रधानमंत्री जन औषधि केन्द्र की प्रशंसनीय योजना है।इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी अवश्य बधाई के पात्र हैं।असली मायनों में असली चिकित्सक की सेवाओं को मानवता की सेवा की शपथग्रहण को यहीं जीव साकार करता है।डिग्री वाले डाक्टरों का इलाज आम जनता के लिए मुश्किल काम भी है।उनका बजट आउट हो जाता है।उनके पास पैसे का अभाव जो होता है।एक मेरे ही गांव के मेरे मित्र श्री सुभाषचंद्र मास्टर जी हैं।आपकी पत्नी दिवंगत गीता देवी का की एस.जी.पी.जी.आई.रायबरेली रोड लखनऊ में केवल जांच ही चलती रही जब तक वह जीवित रहीं इलाज होने के पहले वह चल बसीं।लेखक यानी प्रमोद कुमार दीक्षित के भाई अजय दीक्षित जोकि उ०प्र०परिवहन नि०के रायबरेली डिपो में संविदा ड्राइवर थे,एक सड़क दुर्घटना में पैर में चोट लगी थी,सिप्स बर्न ऐण्ड ट्रामा सेन्टर, शाहमीना रोड,लखनऊ में इलाज चला 3महीने एक लाख 90हजार ,18 बोतल खून बेवकूफ बनाकर ठगे गयेऔर पैर भी कटवाना पड़ा।न तो सरकार से एक पैसा इलाज के लिए मिलान ही निगम कोई संविदा की ही सही नौकरी देने को तैयार है।बिचारे विक्लांग भी हुए और बेरोजगार भी।चिकित्सा में जहाँ आवश्यक हो जाँच करवाने को कहा गया है।लेकिन अब तो जाँच में कमीशन होने के कारण इतनी जांचें लिख दी जाती हैंकि आम जन मानस केवल जांच ही करवा पाता है इलाज से पहले ही गम्भीर रोगी की आत्मा परमात्मा के साक्षात्कार हेतु परमात्मा के सामने उपस्थित हो जाती है।झोलाछाप चिकित्सक को झोलाछाप कहकर उपहास जरूर उड़ाया जाता है लेकिन जो साधारण बुखार 40--50रुपए में ठीक हो जाता है वह साधारण बुखार डिग्री धारक चिकित्सक के यहां जांच,फीस,दवा के मिलाकर4--5हजार लग जाते हैं।कमोबेश दोनों प्रकार के चिकित्सकों द्वारा मिलती-जुलती ही दवाएं लिखते/देते हैं।
हमारे गांव देहातों में हड्डी टूट-फूट में बैठाने वाले बांस की खपच्चियों और अलसी के तेल के द्वारा ठीक कर लेते हैं।डाक्टर आपरेशन सहित पचास हजार रुपए लेते हैं।इन झोलाछाप डाक्टरों के रजिस्ट्रेशन नंबर न होने के कारण शासन-प्रशासन का डर मानव सेवा करते हुए भी बना रहता है।गांव देहातों में रात को आपको चोट लग जाए खून तेज बह रहा हो तो सरकारी डाक्टर मिलनें से रहा,डिग्री हासिल डाक्टर जागकर उठनें से रहा उस संकट की घड़ी में भी झोला छाप डाक्टर पट्टी दवा करने के लिए तत्पर है।तो सच्चे मायने में वह झोला छाप उस समय सही मायने में एम.बी.बी.एस.से कहीं अधिक मानवता की सेवा करनें वाला है।लेकिन उसके पास डिग्री नहीं है।सेवा अधिक दिया लेकिन वह डाक्टर नहीं है।अगर इन झोला छाप डाक्टरों की सेवाओं को नजरअंदाज कर दिया जाय तो सरकार के स्वास्थ्य विभाग की दम नहीं हैकि भीड़ को काबू में कर सके।हमारे देश में प्रति व्यक्ति के अनुपात में रजि०डाक्टरों कीकाफी कमी है।एक अरब तीस करोड़ आबादी तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना दुरुह नहीं तो मुश्किल जरूर है।यह जीव स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं होगी।आखिर यह झोला छाप किसी न किसी प्रशिक्षित डाक्टर के ही सिखाये हुए होते हैं।अतःकार्य कुशलता में ज्यादा कमी नहीं होती है।केवल डिग्री का ही अभाव होता है।किसी भी विधा का स्नातक/स्नातकोत्तर झोला छाप डाक्टर यदि सफलतापूर्वक चिकित्सा कार्य करने का 10-15 साल का अनुभव रखनें वाला झोला छाप डाक्टर है तो उसे सरकार को पैरा1,2,3,4,5,6,-------किसी भी पैरा के अन्तर्गत रजिस्ट्रेशन नंबर दे देना चाहिए।या फिर उस गांव स्वास्थ्य मित्र बनाकर ही उसे प्राथमिक इलाज की आज्ञा दे देनी चाहिए।ताकि वह निर्भय होकर स्वास्थ्य सेवाओं को मानवता के हित में और गति दे सके।स्वास्थ्य रक्षा की असली जिम्मेदारी उठाने वाला जीव सरकार की नजर में बिना रजिस्ट्रेशन नंबर के ही कारण उचित पहचान नहीं पा रहा है।अवैध होने के कारण इनका कोई संघ /यूनियन भी तो नहीं है।अन्यथा वोट के लालच में ही सही सरकार पक्ष या विपक्ष किसी न किसी की दृष्टि इन तक जरूर जाती।आदर का पात्र होनें की जगह इन्हें झोला छाप कहकर इनका उपहास उड़ाया जा रहा है।सेवा की मेवा वाली कहावत यहां सटीक नहीं बैठती है।
सरकार से निवेदन है कि शिक्षित और अनुभव धारकों को किसी न किसी प्रकार का रजिस्ट्रेशन नंबर देकर खुलकर काम करनें का अवसर देना चाहिए।ताकि यह चिकित्सक भी स्वास्थ्य विभाग की मजबूत कड़ी के रूप.में मुख्य धारा में लाया जा सके।

धन्यवाद।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।


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नेताओं की यौनलिप्सा मे संलिप्तता 

आदरणीय सम्पादक जी सादर प्रणाम।
हमारे  राज नेताओं की यौनाचार में संलिप्तता की कहानियों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है।सुरा,सुन्दरी इनकी सदा से ही पहली पसन्द रही है।पैसा और रसूख की कोई कमी नहीं होती है इनके पास।पुलिस इनकी चेरी बनकर घूमती रहती है।जनता जिसे वोट देकर अपना रक्षक नियुक्त करती है,वहीं रक्षक भक्षक बनकर उनकी खुशियों में ग्रहण लगा देता है।यदा-कदा ही इनके यौन कुकृत्य उजागर होते हैं।इनके बाकी सारे यौन कुकृत्य धनबल,गुण्डा-गर्दी,पुलिस सहयोग से दबा दिए जाते हैं।कुछ स्कैंडल मीडिया की वजहों से वायरल हो जाते हैं।तो मजबूरन केस फाइल करना पड़ता है।और फिर इनको इनकी असली जगह जेल जाना ही पड़ता है।जेल में भी इनको पैसा और रसूख के चलते इनकी गतिविधियों में कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।उनकी सुरा,सुन्दरी की पहली पसंद की पूर्ति बदस्तूर जारी रहती है।इनकी आदतों में कोई सुधार नहीं होता है।हमारे राज नेताओं का नैतिकता लगातार गिरती ही जा रही है।कुछ मामलों में गन्दे चरित्रों वाली लड़कियां अधिक धन के लालच में इन्हें फसाने का कार्य भी करती हैं।लेकिन अधिकांश मामलों में सच्चाई ही होती है।
सरकार से तथा राजनीतिक दलों से सादर अनुरोध है कि दागी राजनेताओं को आगामी चुनावों में टिकट से वंचित कर देना चाहिए।जिससे इनकी दैनिक यौनाचार की घटनाओं में कमी लाई जा सके।

धन्यवाद।
प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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