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किसानो की दुर्दशा



भारत देश के लोगों में 70% लोगों का मुख्य पेशा कृषि (अन्नदाता) है।इन्हीं 70%लोगों के कन्धे पर सवा अरब जनसंख्या के पेट भरने की जिम्मेदारी है।इसके अतिरिक्त विदेशों में भी निर्यात करके विदेशी भाइयों के भी पेट की आग शांत करता है।इसीलिए किसान भाइयों को"किसान भगवान"कहा जाता है।"अन्नदाता"की भी उपाधि प्राप्त है।जब किसान का पेट स्वयं भूखा रहेगा तो वह कैसे धरती का सीना चीर कर कैसे अन्न पैदा करेगा?किसान इधर फसल पैदा करता है उधर नई फसल के लिए जुताई, मयाई,बीज,खाद,दवाई, श्रमिक तक उसकी पूरी फसल बिक चुकी होती है।घरेलू खर्च,औरत,बच्चों की दवा इलाज आदि में सारे पैसे समाप्त हो चुके होते हैं।नई फसल के इन्तजार में आंखें गड़ा कर सही फसल के लिए के लिए भगवान से अनुनय-विनय करने में जुट जाता है।भूगोल का एक बहुत प्रचलित प्रश्न है---------भारतीय कृषि मानसून पर आधारित है, भारतीय किसान मानसून से जुँआ खेलता है।किसानों की आय दोगुनी करने की प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सरकार नें घोषणा की है।जो स्वागत योग्य है।यदि भारतीय किसान की दशा--दिशा सुधर जाये तो भारत पुनः एकबार सोने की चिड़िया बन सकता है इसमें जरा सा भी सन्देह नहीं है।सरकार नें के.सी.सी.योजना लागू कर रखी है लेकिन किसान की के.सी.सी.लिमिट अन्य ,घरेलूखर्च इलाज, बच्चों की पढ़ाई आदि अनेकों जन्जालों में ही खर्च हो जाती है कृषि पर खर्च आते-आते किसान पुनः कर्जदार हो जाता है।फसल पुनःकर्ज दाताओं की जेब में चली है।किसान फिर कर्जदार का कर्जदार ही बना रहता है।भुगोल का यह भी प्रश्न बड़ा रोचक होता था----भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है।जीवन भर कर्ज ढ़ोता रहता है ।कर्ज में ही मरता है और आपनें बच्चों के लिए कर्ज छोंड़ जाता है।भारतीय किसान को जमीन की सरकारी मालियत के हिसाब से किसान की कुल जमीन की कीमत के हिसाब के.सी.सी.लिमिट बनाई जाने की जरूरत है ताकि किसान वक्त जरूरत पर रकम निकाल सके और प्राइवेट महाजनों, सूदखोरों के चंगुल से बच सके।आखिर जब आप किसानों की पूरी जमीन बंधक बना लेते हैं तो उस जमीन की वर्तमान सरकारी कीमत का 1/10,1/9 क्रमशः1/1की भी तो के.सी.सी.लिमिट नहीं जारी की जाती है।यदि किसानों की आय दोगुनी करनी है तो पहले किसानों को स्तर सुधार कर ही बढ़ाई जा सकती है जब तक किसान भण्डारण कर उचित समय उचित दर पर बेंचकर आय दोगुनी तो नहीं परन्तु बढ़ाई जरूर जा सकती है।किसानों की केवल ऋण सीमा बढ़ाने से भी किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है।किसानों को प्राकृतिक आपदाएं की भी मार सहनी पड़ती है।इस समय किसानों को बाढ़,सांड़ की मार झेल रहा है।तालाबी जमीन लगभग डूब कर फसल नष्ट हो चुकी है।ऊपर वाली जमीन की फसल सांड़ों द्वारा चरी जा रही है।बाढ़,सांड़ किसानों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं।नीचे की फसल बाढ़ खांय।ऊपर की फसल सांड़ खांय।केन्द्र और राज्य सरकारें किसानों की मदद के आगे बढ़ कर आई हैं।इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है।केरल की बाढ़ की विभीषिका की सहायता के लिए भी योगी सरकार ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। और प्रशंसनीय कार्य किया है।किसानों को मुआवजे के तौर बीमा कम्पनियों, सरकार पर अतिरिक्त बजट बढ़ाने का भार अवश्य पड़ेगा।


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