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भारत मे पशुधन की दयनीय दशा।



आदरणीय सम्पादक जी सादर प्रणाम।

भारत का नाम जनधन के हिसाब से विश्व में दूसरे नं.पर है।परन्तु पशुधन की गणना के हिसाब से भारत विश्व में पहले नं.पर है।पशुधन में विश्व में पहले नं.पर होनें के कारणवश ही भारत का चमड़ा उद्योग भी काफी उन्नति पर है।जूतों के निर्यात से बड़ी मात्रा में राजस्व की वृद्धि होती है।भारत में गाय को माता तथा बैल को शंकर जी के वाहन अर्थात नन्दी का गौरव प्राप्त है।भैंस को महिषासुर की बहिनी तथा भैंसा को यमराज के वाहन के रूप में मान्यता प्राप्त है।दुग्ध उद्योग किसानों का सहायक उद्योग कहा जाता है।हम प्रतिव्यक्ति औसत दूध में भले ही पीछे हों परन्तु पशुधन में सबसे आगे हैं।दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश होने के कारण ही हम प्रतिव्यक्ति दूध में हम पीछे चले जाते हैं।भारत के अन्य राज्यों की तुलना में भारत का ह्रदय कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में लोगों की मानसिकता कुछ जरूर बदली है।वर्तमान"योगी सरकार"द्वारा गोवंशीय पशुओं के वध पर रोंक लग जानें के कारण गोवंशीय पशुओं को सड़कों पर छुट्टा छोंड़ देनें की प्रवृति का एक ट्रेण्ड सा चल ने कला हैं।यहीं कारण है कि सड़कों और गांवों में छुट्टा पशुओं की संख्या में खासी वृद्धि हुई है।जिसके कारण यातायात विभाग की व्ववस्था लगभग चरमरा सी गयी है।सड़कों पर हादसों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।किसानों के पास वैसे भी दर्द की कोई कमीं नहीं थी।फसल रखाने का एक और सिरदर्द शामिल हो गया है।उत्तर प्रदेश में खराब पशुधन के कारण आगरा और कानपुर का चमड़ा उद्योग जो काफी उन्नत था उसमें गिरावट दर्ज की गई है।

उरुग्वे देश की तरह पशुगणना के समय माइक्रो चिप लगा दी जाती है ताकि उसके मालिक का पता लगाया जा सके,इसी तरह की पशुगणना की भारत में भी जरूरत है।उत्तर प्रदेश की पशुधन की स्थिति में यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो पशुपालन विभाग के पास कर्ज में ली गयी भैंसों का स्वास्थ्य प्रमाण पत्र और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक ही काम सीमित हो जाएगा।इस विभाग को बचाने के लिए पहले पशुओं का बचाया जाना जरूरी है।उ०प्र०में गोवंशीय पशुओं की दशा ज्यादा खराब है।यदि आपको देशी गाय का दूध अनुपान स्वरूप दवा खानें के लिए जरूरी है तो आपको काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है।फिर भी आपनें जो दूध अर्जित किया है जरूरी नहीं है कि वह देशी गाय का ही है।अपनें सामने दूध दुहानें पर ही विश्वास पूर्वक कह सकते हैं अन्यथा नहीं।वह दिन भी दूर नहीं जब शादी,ब्याह और मांगलिक सुअवसरों पर देशी गाय के गोबर से बनाई जानें वाली "गौरि"का बनना भी संकट में पड़ जाएगा।शहरों मे मांगलिक कार्यों में बनी गौरि को विश्वास पूर्वक नहीं कह सकते हैं कि देशी गाय के गोबर से ही निर्मित है।शास्त्रोक्त बिधि में देशी गाय के गोबर से ही बनी गौरि को ही पूजन हेतु मान्यता प्राप्त है।जो देश गोपाल का देश रहा है वहां भी गायों को सबसे दुर्दिन के दिन इन दिनों देखना पड़ रहा है।जिस देश में भगवान कृष्ण को भी गाय चराना पड़ा हो उस देश में गायों को दुर्दशा झेलनी पड़ रही है।कहाँ गये नन्हें-2ग्वाल,गोपाल ?क्या सभी बाल,गोपाल, ग्वाल मिड डे मील खानें सरकारी प्राइमरी स्कूलों में चले गये हैं ?यदि हाँ तो फिर प्राइमरी स्कूलों में छात्र संख्या क्यों घटती जा रही है ?

अतःसरकार से निवेदन है कि पूरे भारत देश खासकर उत्तर प्रदेश में पशुधन की गणना तथा दशा सुधारने की जरूरत है।नहीं तो पशुपालन विभाग को बैठने का वेतन देना पड़ेगा।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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