Skip to main content

[ 14 ] वाणी का प्रभाव

gsorg.com
वाणी का प्रभाव
      आज हम आपको अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन के एक प्रसंग के बारे में बताएंगे कि उन्होंने किस प्रकार अपने एक संसद को अपने वाक् चातुर्य से निरुत्तर कर दिया था | लिंकन ने एक बहुत ही गरीब परिवार में जन्म लिया था | अपनी कुशलता तथा योग्यता के बल पर वे अपने देश के राष्ट्रपति बने | एक बार वह किसी विषय पर अमेरिकी संसद को सम्बोधित कर रहे थे उनका भाषण ओजस्वो और जोशीला था | जिसके कारण उनका स्वर धीरे धीरे तेज होता गया | उनको निरुत्साहित करने के उद्देश्य से एक संसद ने जो किया ,उसका वह वार उन्ही को उल्टा पड़ गया | प्रसंग कुछ इस प्रकार है |   
       अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ऐक बार संसद में बोल रहे थे। इसपर एक सामंती मानसिकता वाले सांसद ने लिंकन को टोकते हुआ कहा कि "ज्यादा जोर से मत बोलो लिंकन, ये मत भूलना की तुम्हारे पिता हमारे घर के जूते सिलते थे अपनी हैसियत मत भूलो।"
     लिंकन ने जवाब दिया,  "महोदय, मुझे पता है कि मेरे पिता आपके घर में आपके परिवार के लिए जूते बनाते थे, और यहां कई अन्य लोग भी  होंगे जिनके जूते उन्होंने बनाये होंगे।वह इसलिए क्योंकि जिस तरह से उन्होंने  जूते बनाए, कोई और नहीं कर सकता। वह एक निर्माता थे। उसके जूते सिर्फ जूते नहीं थे, उन्होंने अपनी पूरी आत्मा उनमे  डाली।
       इतना कहने के पश्चात उन्होंने उन संसद महोदय से कहा कि मैं आपसे पूछना चाहता हूं, क्या आपको कोई शिकायत है ? क्योंकि मुझे पता है कि खुद कैसे जूते बनाना है |  अगर आपको कोई शिकायत है तो मैं जूते की एक और जोड़ी बना सकता हूं।
       अपनी बात को आगे बढाते हुए उन्होंने पुनः कहना जारी रखते उनसे पूछा : - लेकिन जहां तक ​​मुझे पता है, किसी ने कभी भी मेरे पिता के जूते के बारे में शिकायत नहीं की है। वह एक प्रतिभाशाली, एक निर्माता थे, और मुझे अपने पिता पर गर्व है! "
       उनके ऐसे जवाब पर वो सामंती सांसद चुप हो गया. लिंकन ने कहा, "अब बोलो चुप क्यों हो गए। तुम मुझे नीचा दिखाना चाहते थे मगर अब तुम खुद अपनी नीच सोच के कारण नीच साबित हुए।"
          लिंकन के उस भाषण को अमेरिका के इतिहास में बहुत मान दिया जाता है , तथा आज भी दिया जाता है | 
      उसी भाषण से एक थ्योरी निकली , जिसे " Dignity of Labour " कहा जाता है | इस थ्योरी का यह असर हुआ की जितने भी कामगार थे ,  उन्होंने अपने पेशे को अपना " सरनेम " बना लिया ,जैसे की शूमाकर, जाँनिटर, बुचर, टेलर, आयरन स्मिथ आदि।
     यही कारण है की आज भी अमेरिका में अन्य देशों की अपेक्षा श्रम को अधिक  सम्मान दिया जाता है  | अमेरिका के अंदर ऐसी ही कुछ बातें  हैं |  , इसीलिए यह अमेरिका ,अमेरिका है तथा  दुनिया का सबसे बड़ी महाशक्ति भी है | 
     इसके विपरीत भारत में जो श्रम करता है उसका कोई सम्मान नहीं है या फिर उसके सम्मान की स्थिति बहुत ही कम है ।यहां लोगो की विचारधारा उलटी है | वे यह मानते हैं कि अमुक व्यक्ति छोटी जाति का है ,  नीच है | यहाँ जो बिलकुल भी श्रम नहीं करता वह ही ऊंचा है ऐसा मन जाता है | । भारत में जो व्यक्ति सफाई करता है उसे लोग यंहा गंदा समझते हैं और जो गंदगी करता है उसे साफ।
      ऐसी सड़ी और विकृत हुई मानसिकता के साथ दुनिया के नंबर एक देश बनने का सपना हम सिर्फ देख सकते है | लेकिन  वो पूरा कभी भी नहीं होगा।ऐसी बीमार मानसिकता से देश की उन्नति तेजी से होने के स्थान धीमी ही रहेगी || 🔺🔻 

Comments

Popular posts from this blog

पुराने बीजो का संरक्षण

नये खाद्यान्न बीजों या शंकर बीजों के आगमन के साथ खाद्यान्नों का उत्पादन अवश्य बढ़ा है।जिसके लिए हमारे कृषि वैज्ञानिक अवश्य ही बधाई के हकदार हैं।आज हम सवा अरब से अधिक लोगों को भरपेट भोजन देनें के अलावा निर्यात भी कर रहे हैं।जिस कारण हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष प्राप्त हो रहा है।लेकिन भारतीय किसानों द्वारा अन्धाधुंध यूरिया और अन्य उर्वरकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग के कारण कुछ देशों का बासमती चावल के आर्डर वापस लेना पड़ा है।जिसके कारण हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी है।जो अवश्य ही चिन्ता का विषय है।कृषि वैज्ञानिकों द्वारा मृदा जांच द्वारा किसानों को प्रशिक्षित कर आवश्यक रसायनों के प्रयोगों के लिए किसानों को प्रशिक्षित किए जानें की आवश्यकता है।     हमारे पुराने जमाने के किसानों द्वारा पुराने बीजों एवं गोबर की खाद तथा खली से उत्पादित खाद्यान्नों एवं सब्जियों में जो गजब का स्वाद एवं सुगंध मिलती थी वह अब नये बीजों एवं उर्वरकों एवं कीटनाशकों से उत्पादित खाद्यान्नों एवं सब्जियों में नहीं पाई जाती है।वह स्वाद,सोंधापन, सुगंध अब धीरे-धीरे गायब होती …

कबिरा शिक्षा जगत् मा भाँति भाँति के लोग।।भाग दो।।

प्रिय पाठक गणों आपने " कबीरा शिक्षा जगत मां भाँति भाँति के लोग ( भाग-एक ) में पढ़ा कि श्रीमती रामदुलारी तालुकेदारिया इण्टर कालेज सेंहगौ रायबरेली की प्रधानाचार्या, प्रबंधक, लिपिकों आदि के द्वारा किस प्रकार शिक्षा सत्र 2015--16 तथा शिक्षा सत्र2014--15 मे किस प्रकार लगभग उन्यासी छात्रों को फर्जी ढ़ंग से प्रवेश दिलाया गया । बाद मे इन्हीं छात्रों को अगले वर्ष इण्टर कक्षा की परीक्षा दिला दी गई। इसके लिए फर्जी कक्षा 12ब3 बनाई गई। बाकायदा फर्जी छात्रों का उपस्थिति रजिस्टर भी बनाया गया। परन्तु सभी छात्रों से प्रथम तथा द्वितीय वर्ष की कक्षाओं मे निर्धारित विद्यालय फीस लेने के बावजूद भी इसका विद्यालय के रजिस्टर पर इन्दराज नही किया गया। यह अनुमानित फीस लगभग साढ़े चार लाख रुपये के आसपास थी जिसे उपरोक्त अधिकारियों / विद्यालय के शिक्षा माफियाओं द्वारा अपहृत / गवन कर लिया hi गया। यथोचित कार्रवाई हेतु इस सम्पूर्ण विवरण को प्रार्थना पत्र मे लिखकर अपर सचिव के क्षेत्रीय कार्यालय इलाहाबाद को दिनाँक 25 /05 2016 को भेजा गया।
अब हम आपको इसके शर्मनाक पात्रों का परिचय करवा देते हैं।
       😢शर्मनाक…