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भारत के संस्कार और भारतीय संस्कृति


( इस लेख द्वारा हम अपना विचार से किसी को प्रभावित नही करना चाहते हैं, और न ही हमारा उद्देश्य मा० सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना करना है ।यह महज एक विचार है ।मेरा मानना है कि विचार तो किया ही जा सकता है )

भारत हमेशा से ही ऋषि,मुनि,मनीषी,विद्वानों का देश रहा है।समय-समय पर हर क्षेत्र में प्रतिभाएँ जन्म लेती रही हैं और अपनी विद्वता, मेधा,विलक्षण प्रतिभा से अपना लोहा मनवाती रही हैं।भारत भूमि वीरों की खान रही है।यहाँ त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम,द्ववापर युग के महानायक लीलाधारी भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली है।यह भूमि चन्दन के समान है।"चन्दन है माटी मेरे देश की।"इसके संस्कार, जीवन मूल्य,बसुधैव कुटुम्बकम"विश्व बंधुत्व की भावन, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया की अर्थात सभी के कल्याण की भावना यानि प्राणिमात्र ही नहीं पशुपक्षियों के भी कल्याण की भी कामना ही इसे अन्य देशों से पृथक करती हैं।भारत को विदेशों में गौरवपूर्ण स्थान दिलाते हैं।यहाँ के आदर्श, संस्कार,जीवन मूल्यों की सराहना और अनुसरण पूरा विश्व करता है।

   मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का एक भारतीय होने के नाते पूरा सम्मान करता हूँ।अगर भूल-चूक से भी कहीं कोई बात लिख भी जाये तो तो मैं एडवांस में ही क्षमा मांगता हूँ।मेरा इरादा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर कोई टिप्पणी नहीं करने का है।मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

अभी हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट के विद्वान जजों द्वारा समलैंगिकता अपराध नहीं, विवाहेत्तर सम्बंध अपराध नहीं, सबरीमाला मंदिर में औरतों का प्रवेश,शनिदेव मंदिर में महिलाओं का प्रवेश की व्यवस्था दी गई।आदेश सिरोधार्य है।हमारे पूर्वजों ने जो भी नियम उपनियम तीज त्यौहारों आदि को तय किया था उसमें वैज्ञानिकता छुपी हुई है।विज्ञान की कसौटी पर हमारे पूर्वजों के बनाए नियम उप नियम सब खरे उतर रहें है।कोई न कोई बात जरूर रही होगी।अन्यथा इन विशिष्ट मंदिरों में आखिर क्यों ओरतों का प्रवेश निषेध किया था?कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा।तुलसीदास नें औरतों की शुचिता को लेकर लिखा होगा----अवगुण आठ सदा उर रहहीं-----साहस,अनृत,चपलता,माया।भय,अविवेक,अशौच,अदाया।।इन आठ अवगुणों का जिक्र राम चरित मानस में आया है।मेरे ख्याल से केवल मंदिर की शुचिता को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया गया होगा।हमारे मनीषियों, विद्वानों, पूर्वजों की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।समाज में हमेशा से ही समलैंगिकता, विवाहेत्तर सम्बंध घृणित नजरों से देखे जाते रहे हैं।आदि काल से यह अपराध की श्रेणी में ही माने जाते रहे हैं।महाभारत काल, त्रेता,सतयुग, कलयुग चारों युगों में अपराध की ही श्रेणी में ही माने जाते रहे हैं।मगर अब अपराध नहीं है।कहीं हम पश्चिमी सभ्यता की ओर अग्रसर तो नहीं होते जा रहें हैं?पूरी दुनिया भारतीय सभ्यता की ओर अग्रसर है और हम पश्चिमी सभ्यता की ओर अग्रसर हो रहे हैं।पश्चिमी सभ्यता अगर इतनी ही लाभदायक होती तो पश्चिम वाले इसे त्याग कर भारतीय सभ्यता की ओर अग्रसर क्यों होते?पश्चिम नें हमको एक भी अच्छी चीज दी हो तो बताओ?पश्चिमी सभ्यता की ओर अंधाधुंध भागना (बिना लाभ-हानि के आकलन के) उचित नहीं है।एक बार पुनर्विचार किए जाने की जरूरत है।विवादित निर्णयों का निर्णय देना ही था तो सबसे ज्वलंत मुद्दा रामजन्म भूमि--बाबरी मस्जिद का है इसका निर्णय सुनाकर इतिहास प्रसिद्ध जजों की सूची में नाम दर्ज करवाया जा सकता था।कश्मीर सहित अनेकों विवादित फैसले लम्बित हैं।जर,जोरू,जमीन तीन ही झगड़े की जड़ें मानी गई हैं।औरतों को लेकर ही रामायण, महाभारत, आल्हा खण्ड में बड़े-बड़े संग्राम हुए हैं।परन्तू अब विवाहेत्तर सम्बंध अपराध नहीं है।भारत अब वाकई इण्डिया बनने की राह पर अग्रसर होता दिख रहा है।



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