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आधुनिक आदर्श नेता ; एक वैचारिक अनुभव नेता

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आधुनिक आदर्श नेता  ;  एक वैचारिक अनुभव 

मित्रों नमस्कार /एक वक्त था कि नेताओं के आचार विचार से आम आदमी प्रभावित होता था और उनसे प्रेरणा लेकर, उनके पदचिह्न पर चलने के साथ उनके आदर्शों को अपनाना चाहता था !उनके एक आह्वान पर अपने जान की बाजी हसते हसते लगाने को तैयार रहता था! लेकिन आज स्थितियां बिल्कुल विपरीत है और कमोबेश नेता शब्द गाली का प्रयाय बनता जा रहा है? इसका कारण क्या है? क्या नेताओं के चाल चरित्र एवं केवल अपने एवं परिवार के लिए ही जीने की प्रवृत्ति ने नेताओं के प्रति अपनी सोच में बदलाव किया है?
ताजा मसला जनपद गाजीपुर में समाजवादी पार्टी के द्वारा विधायक वीरेन्द्र यादव जी के नेतृत्व में आयोजित, लोकसभा के भावी चुनाव को दृष्टि में रखकर बूथवार कार्यकर्ता सम्मेलन का है, जिसमें जब राज्य के सपा के आमंत्रित नेताओं के विचारों को बिना सुने भीड़ जाने लगी तो समाजवादी पार्टी के विधायक /कार्यक्रम के आयोजक वीरेन्द्र यादव जी ने मंच से ही घोषणा की "आप लोग रूकें, आप लोग अतिथियों को सुनकर ही जाये, आप लोगों को मिठाई एवं लंच पैकेट मिलेगा "!क्या उक्त कार्यक्रम में सम्मिलित भीड़ भाड़े की भीड़ थी? क्या उक्त कार्यक्रम में सम्मिलित भीड़ मिठाई व लंच पैकेट के लिए आई थी या सत्तारूढ़ दलों ने आम आदमी को इतना निरीह, भूखा, नंगा बना दिया है कि मुल्क का वास्तविक मालिक मतदाता इतना विवश हो चुका है कि वह लोकतंत्र के पावन पर्व को अपनी भूख मिटाने का माध्यम समझ बैठा है और नेता भलीभांति यह समझ चुके हैं कि देश के आम आदमी को बहुत थोड़े से लालच देकर, उसके वोट को लालच से, धर्म, जाति, हिन्दू, मुस्लिम की खाई पैदा करने के साथ लूटकर, पांच साल सत्ता में पहुंचने के बाद निर्बाध तरीके से सत्ता का दोहन हर प्रकार से किया जा सकता है?
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री माननीया ममता बनर्जी की छवि प्रो मुस्लिम गढी गई है या उन्होंने स्वयं एक वर्ग के वोटों की लालच में गढी है! लेकिन आगामी लोकसभा के चुनाव में इस छवि से वोटों का नुकसान होने की संभावना से, उन्होंने पश्चिम बंगाल की जनता के टैक्स के खजाने से, 28करोड़ रूपये पश्चिम बंगाल में होने वाली दुर्गा पूजा समितियों को देने का निर्णय लिया! लेकिन उच्च न्यायलय ने ममता बनर्जी की ,दुर्गा पूजा समितियों के जरिए वोटों के जुगाड़ के खेल पर, खजाने के पैसे को फिजूलखर्ची बताकर, उनके इरादों पर तुषाराघात कर दिया?
मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाला सहित किसानों के आंदोलन से घबड़ाये, पिछड़े वर्ग की सत्ता में व्यापक हिस्सेदारी की चाहत ने, मध्य प्रदेश के पन्द्रह साल से सत्ता में रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नींद उड़ा दिया है! 6करोड़ पेड़ लगाने के प्रकरण में संतो द्वारा यात्रा निकालकर जांच की मांग करने वाले कम्प्यूटर बाबा जैसे लोगों को लालबत्ती देकर मैनेज करने का गुर तो उन्हें बखूबी पता ही था, लेकिन इधर मध्य प्रदेश के हजारों पुजारियों को भी मासिक वृत्ति पन्द्रह सौ रूपये देकर, धर्मसत्ता के जरिए, मध्य प्रदेश की सत्ता को पुन:साधने का खेल रचा है?
यूपी में तो राजेश अग्रवाल जी वित्त मंत्री के द्वारा पेश वार्षिक बजट में 2000करोड़ रूपये की व्यवस्था कुंभ मेला के लिए किया ही गया  ,बल्कि दीपावली व होली के लिए सैकड़ों करोड़ का बजट की व्यवस्था कर रखी है और हमारे मठाधीश मुख्यमंत्री जोगी बाबा ने कहा कि कुंभ मेला में बजट की व्यवस्था पहले से ही होती रही है? यानी हमारी सरकार ने नया कुछ नहीं किया है? यानी आप यह सवाल नहीं खड़ा कर सकते कि दिल्ली की सरकार, शिक्षा पर प्रति व्यक्ति 11000रूपये से ज्यादा खर्च करती है और यूपी की सरकार मात्र 11रूपये 52पैसे?
  हमारे देश के मानव संसाधन मंत्री कहते हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों को कटोरा लेकर भीख मांगने के लिए नहीं आना चाहिए? देश जानना चाहता है कि आखिर जनता के टैक्स के पैसे के खजाने को, कल्याणकारी राज्य की संकल्पना के अनुरूप खर्च करने के बजाय, गैर उत्पादक कार्यो, फिजूलखर्ची पर व्यय करने का अधिकार किसने दिया है? जनता हो सकता है नासमझ है और सत्तारूढ़ पार्टियों ने जान बूझकर उनमें जागरूकता, कल्याणकारी राज्य के स्वरूप के लिए संघर्ष करने की प्रवृत्ति,  वैज्ञानिक चिन्तन की भावना बलवती नहीं होनी दिया लेकिन जनता इतनी भी नासमझ नहीं कि सत्ता के लूटतंत्र को बिल्कुल समझ नहीं सकी है? कहते हैं कि देर है लेकिन अंधेर नहीं? अब जनता नेताओं के अंधेरे के बजाय संविधान के कल्याणकारी स्वरूप के लिए संघर्ष करने की प्रवृत्ति पैदा कर रही है!
जय संविधान, जय सरदार पटेल जय डाक्टर सोने लाल पटेल जय डाक्टर अम्बेडकर, जय शाहूजी महाराज, जय सयाजीराव गायकवाड़, जय किसान, जय पिछड़ा वर्ग, जय वंचित समाज, जय हिस्सेदारी!

                                                                        Arjun singh patel

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