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रक्त पिआसु और भृष्टाचारी

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रक्त पिआसु और भृष्टाचारी
आदरणीय सम्पादक जी सादर प्रणाम।
पुराने जमाने में हमारी ईमानदारी, सत्यता,सदाचार के चर्चे देश,विदेशों में हुआ करते थे।लोगों में ईमानदारी, सत्यता गुरुकुलों, आश्रमों में कूट-कूट कर भरे जाते थे।चीनी यात्रियों ह्वेनसांग, फाह्यान नें अपनी-अपनी पुस्तकों में उल्लेख किया है कि यदि आपकी कोई वस्तु खो जाती थी तो वर्षों बाद भी उसी जगह पड़ी मिलती थी।कोई उस वस्तु को उठाया नहीं करता था।ईमानदारी के ऐसे उदाहरण मिला करते थे।यहां लालच,बेईमानी के लिए कोई स्थान नहीं था।सदाचार और धार्मिक शिक्षा,शास्त्रों, शस्त्रों की शिक्षा गुरुकुलों, आश्रमों में ऋषियों, मुनियों, विद्वानों द्वारा कूट-2कर भरी जाती थी।गरीब-अमीर की शिक्षा में कोई भेदभाव नहीं था।गुरू संदीपनि मुनि के आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण और गरीब सुदामा के एक साथ शिक्षा ग्रहण करने का बहुत ही सुंदर उदाहरण मिलता है।द्रुपद नरेश और गुरू द्रोणाचार्य की शिक्षा भी एकसाथ और एक ही आश्रम में होने का उदाहरण मिलता है।हमारे सदाचार और ईमानदारी की कसमें खाई जाती थी।
जब से भृष्टाचार रूपी राक्षस का जन्म हुआ तबसे हम धीरे-धीरे अनैतिक होते चले गए।आज स्थिति यह है कि हम भृष्टता,बेईमानी में रिकॉर्ड बनाने की ओर अग्रसर हैं।रिकॉर्ड दर रिकॉर्ड कायम करते चले जा रहे हैं।आज हम इतना गिर चुके हैं कि पैसे के लिए चोरी,डकैती और हत्या जैसे अपराध करनें में भी नहीं हिचकते हैं।पहले यह सत्य कहावत थी--"धन यदि गया,गया नहिं कुछ भी स्वास्थ्य गए कुछ जाता है।सदाचार यदि गया मनुज का तो सब कुछ लुट जाता है।"अब नौबत स्कूलों में नैतिक शिक्षा पढ़ाने की आ गई है।फिर भी लेशमात्र भी नैतिकता नहीं है।आज ईमानदार वहीं है जिसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिला।हमारे आदर्श नेता, पुलिस, आम नागरिक सब भृष्टता में रिकॉर्ड कायम करते जा रहे हैं।समाज को आइना दिखाने वाले साधु,संत,सन्यासी भी सदाचारी बचे हैं।ऐसा नहीं है कि ईमानदारी बिल्कुल ही गायब हो गई है।पर बिरले उदाहरण ही यदा-कदा देखने, सुनने को मिल ही जाते हैं।कमोबेश सबकी चादर दागदार ही ज्यादा है।लेकिन ऐसे कम ही लोग हैं जिनकी चादर में दाग नहीं है।बेईमानी, लालच,लम्पटता में लगभग सभी लिपटे हुए हैं।आज इस बात के रिकॉर्ड बन रहे हैं कि हम कितने ज्यादा अनैतिक हैं।जो जितना बड़ा भृष्ट और अनैतिक है आज सांसद/विधायक के टिकट की दौड़ में सबसे आगे है।यदि आज मोहनदास करमचंद गांधी जिन्दा होते तो अपने सपनों का भारत देखकर सिर धुन रहे होते।क्या हुआ हमारे नैतिक मूल्यों का?कहां खो गई हमारी ईमानदारी?बेईमानी, भृष्टाचार हमारे खून,अस्थि,मज्जा में रच-बस गई है।हम अपने सगे सम्बन्धियों का खून भी पेसे के लिए करनें में भी नहीं हिचक रहे हैं।अब भगवान ही भारत में पुनःसदाचार वापस ला सकते हैं।
प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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