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कुण्ठित प्रतिभा / प्रतिभा पलायन


भारत भूमि हमेशा से ही प्रतिभा सम्पन्न  लोगों की भूमि रही है।यहां प्रतिभाएं गली,कूचों,मुहल्लों में थोक के भाव भरी पड़ी हैं।जरूरत उन्हें तराश कर कोहिनूर हीरा बनाने की है।यह जरूरी नहीं है कि केवल शहरों में ही प्रतिभा सम्पन्न बच्चे मिलेंगे।गांव देहातों में भी शहरों की भांति विलक्षण प्रतिभा धनी बच्चे पाए जाते हैं।जरूरत एक पारखी नजर की है जो प्रतिभा ढ़ूंढ़ सके।
  हमारे देश में जब से भृष्टाचार नें जन्म लिया है , तब से प्रतिभाएं कुण्ठित ज्यादा हो रही हैं।लगभग हर बार प्रतियोगी परीक्षाओं के समय पर्चा आउट होना एक आम बात होती जा रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सादी कापी जमा करना भी एक ट्रेण्ड बनता जा रहा है।सादी कापी वह अभ्यर्थी ही  जमा करता है जिसकी सेटिंग- गेटिंग पहले से ही हो जाती है। ऐसे प्रकरणों में 5-6 लाख रुपयों में में पहले से ही सौदा पक्का हो जाया करता है। सौदे के आधे पैसे एडवांस जमा हो जाया करते हैं, बाकी पोस्टिंग लेटर मिलनें के बाद। जहां ऐसी सेटिंग-गेटिंग पहले ही हो जाती हो वहां प्रतिभा आखिर क्या मायने रखती है।रिजल्ट घोषित होनें पर हम पाते हैं उत्तीर्ण अभ्यर्थियों में रिश्वत देनें वाले ही ज्यादा होते हैं। ऐसे में प्रतियोगी परीक्षा और इसके माध्यम से प्रतिभा की खोज का क्या मतलब ? ऐसे मामलों में  तो  पहले से ही घूस देने वालों को ही उत्तीर्ण होना है।फिर इस व्यर्थ के दिखावेऔर परीक्षा का क्या फायदा?इस सब चाटक- नाटक की आखिर जरूरत ही क्या ? इससे प्रतिभाएं कुण्ठित नहीं होंगी तो और होगा ही क्या ?  जिनके पास पैसा और पहुंच दोनों हैं वह कहीं न कहीं नौकरी पानें में सफल हो ही जाया करते हैं।अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के सामनें यह संकट और विकराल हो जाता है।एक तो आरक्षण की मार ऊपर से घूस का चलन ,एक तो करेला ऊपर से नीम पर चढ़ने वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।मजबूरन प्रतिभाएं कुण्ठित होकर पलायन वादी रुख अख्तियार करनें पर मजबूर हो जाती हैं।आप किसी भी प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम का अध्ययन कर सकते हैं उपरोक्त बाते सच पाएंगे।पैसा और पहुंच वाले अपने-2 लड़कों को जो अपेक्षाकृत कम योग्य हैं उनको चयनित अभ्यर्थियों की सूची में स्थान दिलवा ही लेते हैं और किसी न किसी प्रतिभा सम्पन्न को बाहर का रास्ता दिखा ही दिया करते हैं।"समरथ को नहिं दोष गुसांईं"की लिखावट सच कर देते हैं।शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में माननीय उच्च न्यायालय ने हकीकत देख ली है।रिकॉर्ड जलाए गये,लीपापोती की गई।आखिर भृष्टाचार न होता तो यह सब करने की क्या जरूरत थी।यह सब करने की।भृष्टाचार रूपी राक्षस का बध करने के लिए भगवान राम को फिर अवतार लेना ही पड़ेगा।वर्ना इस भृष्टाचार रूपी राक्षस का बध असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है।बिना भृष्टाचार के बध के प्रतिभा कुण्ठित होनें और पलायन होनें से नहीं रोका जा सकता है।
प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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