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[ e14 ] सन्देह के घेरे मे जाँच एजेन्सियां

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[ e ] सन्देह के घेरे मे जाँच एजेन्सियां
आदरणीय सम्पादक जी सादर प्रणाम।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था, पुलिसिंग सिस्टम विश्व स्तरीय है।एक से बढ़कर एक पुलिस आफीसर्स योग्य और जीनियस हैं।उनकी योग्यता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता है।निःसंदेह सुयोग्य आफीसर्स का चुनाव किया जाता है।
     विडम्बना यह है कि पहले पुलिस की जाँच को कभी भी कहीं भी विश्वास नहीं किया जाता है।अदालतें हमेशा से ही पुलिस की जाँच को संदेह के घेरे में मानती रही है।भृष्टाचार और पुलिस का चोली-दामन का साथ रहा है।यदि पुलिस को भृष्टाचार का जनक या जननी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।पुलिस वाले हर जगह,हर मौके पर कमाई का जरिया निकाल ही लेते हैं।इसी सम्बंध में कहा गया होता---"ई वर्दी पहिनें पुलिस केरि,ई काम बनावैं लत्ता ते।मन माना शहद निकारि लियैं ई बर्रइन के छत्ता ते।।"इण्डियन पुलिस की कार्य प्रणाली कुछ-कुछ इसी तरह की है।यू.पी.और बिहार की पुलिस तो आकंठ भृष्टाचार के दलदल में डूबी हुई है।जेल में जितने भी कैदी या हवालाती बन्दी बन्द हैं अगर निष्पक्ष जाँच करवाई जाय तो 90%पुलिसिया आतंक के शिकार निर्दोष लोग ही जेल काट रहे हैं।"अन्याय हंस रहा है यहां न्याय रो रहा है।अधर्म हंस रहा है यहां धर्म रो रहा है।"
  हद तो तब हो गई जब शीर्ष जाँच एजेंसी सी.बी.आई.के शीर्षस्थ आफीसर्स वर्मा,अस्थाना जी पर आरोप लगे ।यह हमारे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि भारत की एकमात्र जाँच एजेंसी सी.बी.आई.के आफीसर्स पर ही भृष्टाचार के आरोप लग रहे हैं।जहां जाँच करने वाला ही आरोपों में लिपटा हुआ है तो उससे फ्रेश &फेयर जांच की क्या उम्मीद की जा सकती है।अब जनता किस जाँच एजेंसी पर विश्वास करे ?
प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों,रायबरेली।🔺🔻

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