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[ lL14 ] धनतेरस


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 [ L 14 ] धनतेरस
क्या आप जानते हैं कि क्यों मनाई जाती है अगर नहीं तो आइए जानते हैं
हमारे धार्मिकग्रंथों में एक कथा आती है कि  एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे , कि उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मी जी ने भी साथ चलने का आग्रह किया. विष्णु जी ने उनके समक्ष एक शर्त रख दी और बोले- 'यदि मैं जो बात कहूं, वैसे ही मानो, तो चलो.'
लक्ष्मी जी ने स्वीकार किया और भगवान विष्णु, लक्ष्मी जी के साथ भूमण्डल पर विचरण हेतु आ गये |
कुछ देर बाद एक स्थान पर आकर भगवान विष्णु लक्ष्मी से बोले- 'जब तक मैं न आऊं, तुम यहां पर ठहरो |  मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर न आना  और देखना भी नही | 
विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी जी को कौतुक उत्पन्न हुआ कि आखिर दक्षिण दिशा मे ऐसा क्या है जो मुझे श्रीविष्णु द्वारा मनाकर किया गया है , और भगवान स्वयं दक्षिण में क्यों गए | कोई कोई रहस्य जरूर है | वह इसी पर विचार करने लगी | जैसे जैसे उनका विचार का समय बढ़ता गया .उनकी उत्सुकता भी बढती गयी |अंत मे लक्ष्मी जी से रहा न गया |  जैसे ही भगवान ने राह पकड़ी, वैसे ही मां लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ी | कुछ ही दूर पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया. वह खूब खिला हुआ और लहलहा रहा था |
वह उधर की ही ओर चल दी . सरसों की शोभा से वे मुग्ध हो गईं , और उसके फूल तोड़कर अपना शृंगार किया और आगे की ओर चल पड़ी |
आगे उन्हें गन्ने (ईख) का खेत खड़ा मिला | लक्ष्मी जी ने चार गन्ने लिए और रस चूसने लगीं | उसी क्षण विष्णु जी आए और लक्ष्मी जी पर नाराज होकर शाप दिया- 'मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानीं | आपने किसान की चोरी का अपराध कर बैठीं | अब तुम सजा के अनुरूप , उस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो.'
ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए.
लक्ष्मी किसान के घर रहने लगीं | वह किसान अति दरिद्र था | लक्ष्मीजी ने किसान की पत्नी से कहा कि , तुम स्नान कर पहले इस मेरी बनाई देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, ऐसा करने से तुम जो मांगोगी वह तुम्हे मिलेगा. किसान की पत्नी ने लक्ष्मी के आदेशानुसार ही किया |
पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से , किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया और लक्ष्मी से जगमग होने लगा |
लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया | किसान के 12 वर्ष बड़े आनन्द से गुजर गए |
12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं |
विष्णुजी, लक्ष्मीजी को लेने आए तो , किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया |
लक्ष्मी भी बिना किसान की मर्जी वहां से जाने को तैयार न हुई |
तब विष्णुजी ने एक चतुराई की | विष्णुजी जिस दिन लक्ष्मी को लेने आए थे, उस दिन “ वारुणी “ पर्व था.
इसलिए किसान को वारुणी पर्व का महत्व समझाते हुए भगवान ने उसे कुछ कोंड़ियाँ देते हुये कहा कि , तुम परिवार सहित जाओ तथा गंगा में स्नान करो , तथा इन कौड़ियों को भी जल में छोड़ देना |
जब तक तुम नहीं लौटोगे ,  तब तक मैं लक्ष्मी को नहीं ले जाऊंगा |  लक्ष्मीजी ने किसान को चार कौड़ियां गंगा के देने को दी |
किसान ने वैसा ही किया. वह सपरिवार गंगा स्नान करने के लिए चला , जैसे ही उसने गंगा में कौड़ियां डालीं ,  वैसे ही चार हाथ गंगा में से निकले और उन हाथों ने  कौड़ियां ले लीं |
तब किसान को आश्चर्य हुआ कि , वह तो कोई देवी है. तब किसान ने गंगाजी से पूछा 'हे माता! ये चार भुजाएं किसकी हैं ?'
गंगाजी बोलीं 'हे किसान ! वे चारों हाथ मेरे ही थे. तूने जो कौड़ियां भेंट दी हैं, वे किसकी दी हुई हैं ?'
किसान ने कहा- 'मेरे घर जो स्त्री आई है, उन्होंने ही दी हैं |  इस पर गंगाजी बोलीं कि तुम्हारे घर जो स्त्री आई है , वह साक्षात लक्ष्मी हैं और पुरुष विष्णु भगवान हैं.
तुम लक्ष्मी को जाने मत देना, नहीं तो पुन: निर्धन हो जाआगे | यह सुन किसान घर लौट आया | वहां लक्ष्मी और विष्णु भगवान जाने को तैयार बैठे थे | किसान ने लक्ष्मीजी का आंचल पकड़ा और बोला कि मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा |
तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें जाने ही कौन देता है ,  पर ये तो चंचला हैं. कहीं ठहरती ही नहीं ,  इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके | इनको तो मेरा शाप था, जो 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं ,  तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है |
किसान हठपूर्वक बोला :- नहीं, अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा | तुम कोई दूसरी स्त्री यहां से ले जाओ |
तब लक्ष्मीजी ने कहा - हे किसान ! तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं जैसा कहूं वैसा करो ,  कल धनतेरस है |  मैं तुम्हारे लिए धनतेरस मनाऊंगी |
तुम कल घर को लीप-पोतकर , स्वच्छ करना |
रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सांयकाल मेरा पूजन करना | एक तांबे के कलश में रुपया भरकर मेरे निमित्त रखना |  मैं उस कलश में निवास करूंगी |
किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी | इस दिन की पूजा करने से मै वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी | अगर तुमको मुझे रखना है तो इसी तरह प्रतिवर्ष मेरी पूजा करते रहना |
यह कहकर वे दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं , और भगवान भी  देखते ही रह गए |
अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया. उसका घर फिर से धन-धान्य से पूर्ण हो गया |
इसी भांति वह हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा करने लगा | तब से आज  तक लोग धन वैभव प्राप्ति का यह त्यौहार “ धनतेरस “ मनाते चले आ रहे हैं |🔺🔻
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